पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - अद्वितीय सच
विधा - लघु कथा
शीर्षक - रिश्तें अनमोल धरोहर है
रिश्तें अनमोल धरोहर है
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अजय अपनी गर्ल फ्रेंड निशा को सरप्राइज देने उसके घर आ धमका,पर खुद ही सरप्राइज हो गया। अपने आप को अत्याधुनिक पोशाकों से सजाए रखने वाली लड़की आज पारंपरिक सलवार सूट में नजर आ रही थी । हमेशा जीन्स टॉप, हाई हील की सैंडल, मुख में लाली लगाने के हिमायती,ऐसा न करने पर अपने सहेलियों को डांटने वाली आज ......।
आज तुम , अचानक! ऐसे? निशा बोली ।
अरे ! तुमने ये क्या पहन रखा है ? अजय ने कहा।
मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था ,पर खुद ही सरप्राइज हो गया।
वो.. वो..तो ऐसे ही, आज वो सब पहनने का मूड नही हुआ तो .....; निशा झेंपते हुए बोली।
निशा एक बुढ़िया के साथ बैठी थी उसे चाय बनाने कहती किचन में भेज दी।
कुशलक्षेम पूछने के बाद अजय बोला ए बूढ़ी अम्मा तुम्हारी दादी है?
नही नौकरानी है ( अपने अत्याधुनिक छवि का मान रखने के लिए ) - निशा बोली ।
वो...वो.. आज मम्मी - पापा घर पर नही है तो रुकने बोल दी थी , तो......।
ओह ! मुझे लगा दादी है।
एनीवे !क्या तुम मेरे साथ मॉल चलोगी ?
निशा स्वयं ही ज्यादा देर तक अजय को अपने घर रुकने नही देना चाहती थी। तपाक से बोली - ऑफकोर्स व्हाई नॉट !
मैं अभी ड्रेस चेंज करके आयी ।
निशा का बेड रूम में जाते ही बुढ़िया चाय लेकर आई- बेटा चाय !
जी अम्मा । अम्मा आप कब से यहां काम कर रही हैं?
बेटा मैं कुछ समझीं नही ?
आप निशा की नौकरानी हो न ?
बुढ़िया कुछ समय चुप रही फिर बोली - हां बेटा ,कुछ 20-25 साल
हुए निशा के दादाजी मुझे यहां रख छोड़े है पहले मैं उन्ही के पास थी । अब वे तो रहे नही , मैं इस घर को छोड़कर और कहीं जा नही पाई।
इसी बीच निशा - अजय चलो जल्दी आज फ़िल्म भी देखेंगें कहती नकली हँसी हँसते बैठक में आ धमकी।
अजय निशा के साथ सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए बैठक की ओर नजर मारते बुढ़िया के ऑंखों की नमी से वास्तविकता भांप लिया। निशा चलो आज मैं तुम्हें अपनी माँ से मिलाता हूँ कहते हुए उसे अपना घर ले आया।
निशा- पर....! वो ...!
संध्या का भोजन बनाने कीचन में घुसी , पसीने में डूबी ,साधारण कद काठी की औरत को गले लगाते अजय बोला माँ ये निशा है , मेरी गर्ल फ्रेंड! झिझकते हुए निशा - हैलो आंटी कहती अभिवादन की। वह सिर हिला अभिवादन स्वीकार की।
अजय ने कहा - निशा ये मेरी माँ है , कम पढ़ी- लिखी , देहाती ,हमारा तौर तरीका नहीं आता इसे पर जैसी भी है मेरी माँ है ; और मैं जो कुछ भी हूँ इनके न जाने कौन- कौन से त्याग ?, कौन -कौन से इच्छा को मारकर मेरे स्कूल के फीस भरे होंगे? मेरी कितने गलतियों को नजरअंदाज करते हमेशा प्रेरित करते रहने के बदौलत हूँ।
तुम्हारे घर में जो बुढ़िया है वो मुझसे ठीक से बात नही कर पाई पर उनकी बातों से इतना समझ गया कि वो तेरी दादी है और उसने तेरा मान रखने के लिए अपने आप को नौकरानी कहला ली। तुम्हारे दादाजी के निधन के बाद शायद वो तुम लोगों का उपहास का पात्र बनी हुई है। निशा ! वास्तव में हम कितना ही अत्याधुनिक हो जाए पर अपनी बुनियाद को गाली नही देना चाहिए क्योंकि बुनियाद के भार सहन करने के कारण ही ऊपर दीवार का आकर्षण बना रहता है।पुरानी पेड़ भले बूढ़े हो जाये पर फल और छाया देना नही छोड़ते वैसे ही हमारे बुजुर्ग भी हमेशा अपने अनुभव के तराजू से दुनियादारी की समझ देते ही रहते हैं। हमें उसका आंकलन कर दुनिया में गुजरना चाहिए।दुनिया साथ दे न दे पर कुछ रिश्तें तोड़ने से भी नही टूटते, ये रिश्तें ही हमारी अमूल्य निधि है। दिखावा कुछ दिन के लिए ही होता है स्थायी नही होता। समझे !
निशा आत्मग्लानि से भर गई। दौड़ते- दौड़ते घर आकर अपने दादी से लिपटकर माफी मांगने लगी। पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। आत्मीयता पाकर दादी भी भावविभोर हो अश्रुधारा से सराबोर हो गई।
- - शैलेन्द्र चेलक - -
Very very nice sir jii
ReplyDeleteExcellent 👌👌👌👌👌
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मार्मिक और आज की सत्य प्रसंग चेलक सर जी
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