Wednesday, September 23, 2020

कोरबा से गोमती सिंह की लघुकथा- बंटवारा

रचनाकार-गोमती सिंह 
जिला-कोरबा छत्तीसगढ़ 
विधा-लघुकथा 
शीर्षक-" बंटवारा "
देखो न माँ! ये पिंक पिंकू मेरे मेरे हिस्से का पटाखा छीन कर ले गया । ऐसा कहते हुए शिखा पिंकू को दौड़ाने  लगी । छीना झपटी में बच्चों को चोट न लग जाये कहते हुए शिखा की माँ पीछे पीछे दौड़ते हुए शिखा का हाथ पकड़ कर बोली -" क्या हुआ बेटी! क्यों झगड़ा हो गये तुम दोनों ।" 
            शिखा कुछ बोलती इससे पहले ही शिखा की माँ बोलने लगी - रहने दे बेटी, वो लाडली बहु का लाडला बेटा है । 
      इतना सुनते ही छोटी बहु के मन में सहन नहीं हुआ । वो प्रसाद की थाली वहीं आँगन के तुलसी चौरे में रख दी । और वो भी पीछा करने लगी । 
          इस तरह त्यौहार कहाँ मनाते घर में घमासान हो गई।
           बंटवारा ऐसा कडुआ शब्द है जो मीठे मिठाई के पीछे भी लग जाये तो उसे कडुआ कर देता है । " मिल बांट कर खा लेना  " ये अलग बात है , मगर इसी को कहें कि बंटवारा कर देना तो उस मीठे से चीज पर भी वैमनस्यता आ जाती है । 
           भारतवर्ष का बंटवारा हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के रूप में हुआ यह तो ऐसा जख्म है जो कभी भर ही नहीं सकता । 
       इसके अलावा हमारे भारतवर्ष की संयुक्त परिवार की  उत्कृष्ट संस्कृति में भी विघटन आ रही है ।
          अब हमारे देश में यह सर्वोच्च संस्कृति  खतम होने के कगार में है । 
        आज से लगभग दस बीस वर्ष पहले की बात है जब गाँव के किसी परिवार में भाई- भाई के बीच मतभेद आ जानें से बंटवारे की बात आने से माँ-बाप को कितना दुख  होता था ।वो इस बात को समाज में छिपाते थे । इस तरह इसे शर्मनाक बात मानी जाती थी । 
             मगर आजकल की आधुनिक शिक्षा में बच्चों में वो संस्कार ही कहाँ पड़ रहे हैं जो देश की इस उत्कृष्ट संस्कृति संयुक्त परिवार में रहकर क्रमशः अपने से बड़ों के आदेशों का पालन करना, कुछ त्याग समर्पण तथा अपनत्व की भावना का संचार करे ।
           आजकल तो भौतिकी और गणित की कंप्यूटरीकृत शिक्षा से बच्चे उसी के अधीन हो गये हैं । 
        सोंचने समझने की क्षमता का पूरा का पूरा समापन हो गया है । 
          परिणाम यही हो रहा है कि छोटे से किसी बात पर थोथा स्वाभिमान का डींग हांकते हुए अलग-अलग रहने की आदत बना रहे हैं । 
         क्या फर्क पड़ता है जब किसी एक बच्चे का पटाखा कोई दूसरा बच्चा बालचपलता वश छीन कर ले गया  ।
               यही तो वह नाजुक वक्त है जब कच्चे मिट्टी जैसे बच्चे को गढा जाता है । उसे सुन्दर ब्यक्तित्व का आकार दिया जाता है।
             उन्हें पारिवारिक जीवन मूल्यों की शिक्षा दी जाती है ।
          ब्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज तथा राष्ट्र का निर्माण होता है । 
      तो आइये शपथ लेते हैं कि संगठन की इस अद्वितीय श्रृंखला को बनाये रखें और एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करें । 
          ।।इति।।
          गोमती सिंह 
   कोरबा छत्तीसगढ़

3 comments:

  1. 💐💐💐बहुत सुंदर विचार हमारी पुरानी संस्कृति को संजोए रखने की जरूरत है👌👌👌

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  2. बहुत सुंदर

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  3. एक अच्छे मुद्दे को उठाने का अच्छा प्रयास दीदी 🌹🌹

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