संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ .ग.)
विधा-लघुकथा
विषय-अद्वितीय सच
*अद्वितीय सच*
लक्ष्मी को बच्चे की रोने की आवाज परेशान किए जा रही हैं ...वह सोच- सोच कर परेशान थी, कि बच्चा क्यों रो रहा है ?उसे लगता है वह जाकर बच्चे को उठा कर ले आएं। बदहवासी में चार- छह कदम चली भी.... मगर आँगन के बीचो-बीच खड़ी दीवार उसको मुँह चिढ़ा रही थी। एक अद्वितीय सच उसे मर्माहत कर गई।घर उसका ...बेटे,बहु उसके मगर जमाना कैसे आ गया है।सब कुछ उसका होने के बाद भी वो मजबूर है। अचानक उसकी आँखों में आँसू झिलमिलाने लगे ....उसे याद आ रहा था कि विवाह के पाँच वर्षो बाद भी जब उसे संतान सुख नहीं मिला था। लोग ताने देने लगे थे। हर देवी देवताओं के मान मनौती के बाद विकास का जन्म हुआ। बड़े लाड प्यार से विकास का पालन पोषण किया ..शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था की गयी।। बैंक में नौकरी भी लग गई ।बड़े धूम-धाम से विकास का विवाह मंजूषा के साथ हो गया।मंजूषा बड़े बाप की बेटी थी ।उसे लोक लाज से मतलब नहीं था ।वह जो चाहती वह करके रहती ।संस्कारों में पला- बढ़ा विकास मन मसोस कर रह जाता था ।बात-बात पर उसे पत्नी झल्लाती थी ।माँ बाप की बिल्कुल भी इज्जत नहीं करती थी ।यह पीड़ा विकास को साले जा रही थी ।एक दिन आधी रात को मंजूषा घर लौटी अपनी सहेली का जन्मदिन मनाने गई थी। इस बात को लेकर दोनों पति- पत्नी में बहस होने लगी। तब लक्ष्मी ने कहा -"नहीं बेटा अच्छे घर की बहू बेटी इतनी रात तक घर के बाहर नहीं रहती" इतना कहना था कि मंजूषा आग बबूला हो गई, और ऐलान कर दिया -"मैं इस घर में नहीं रहूँगी... मुझे कोई रोके टोके तो अच्छा नहीं लगता।" विकास घर छोड़कर भी कैसे जाएं ....बूढ़े माता -पिता का प्यार ....उसका अपना कर्तव्य बोध ....उसे बाँधे रखा था ।मंजूषा ने तो तय कर ही लिया था ।अंत में घर में रहना तो स्वीकार किया मगर शर्त थी कि मैं बगल वाले पार्ट में रहूँगी ....और आँगन के बीचोंबीच एक दीवार खड़ी होनी चाहिए ....ताकि मुझे कोई देख ना सके.... न कोई रोक सके ।एकदम दुश्मन जैसा बर्ताव करने लगी थी ।कहते है " *मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है"* आज ब्याज के रूप में नाती का रोना उसे बहुत आहत कर गया। मन ही मन उसको *पछतावा* होने लगा कि इससे अच्छा तो वह निःसंतान ही रहती तो अच्छा रहता उसे आज यह दिन देखने तो नहीं पड़ता । आज वह एक अनचाहा अद्वितीय सच के सामने नट मस्तक हो गई है। *अद्वितीय* * अर्थात और कोई दूसरा ना हो।आज जो *अद्वितीय सच* का सामना कर रही है।उससे बड़ा या दूसरा सच तो हो ही नहीं सकता।वह इन्हीं विचारों में खोई अतीत के पृष्ठों को पलटने लगी......।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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