जिला-कांकेर छग
शीर्षक-सड़कें
विधा-कविता (मुक्त छंद)
सड़के लंबी -लंबी पगडंडियों के बीच वीरान
जंगलों में भी शांत
मंजिल का पता बता जाती हैं|
कहीं ठोकरें तो कहीं हादसा से
रक्त रंजीत ऊबड़ -खाबड़ रहती
पर राही को राह दिखाती ही हैं|
अपनी व्यथा किससे कहें रोज ही
हो रहे दर्दनाक मौत की साक्षात
मूक गवाह होती हैं ये ही सड़के|
आज कल ये कागजों पर बनती हैं
शहर-शहर गाँव- गाँव अपनी ही
दुख से पिघलती मौन हैं सड़के|
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर छग
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