पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विधा - मुक्तक
शीर्षक - भयग्रसित मन
भयग्रसित मन
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असफलता मिलती पग - पग ,
निराशा से घिर जाता है जीवन ,
सब कुछ सही करने पर भी ,
भयग्रसित हो जाता है मन ,
मन के भयग्रसित होने से ,
अंतर्द्वंदों का तूफान चले ,
फिर टोकना भी गैरों का ,
यूं लगे शब्दों के बाण चले ,
विवेक क्षीण हो जाता फिर ,
मनोबल बेदम दिखता है ,
हार का डर सताने लगता ,
वो , तन्हाई भाग्य में लिखता है ,
अवसादग्रसित होकर,
पूरा सामर्थ्य न कर पाता ,
मेरा न कोई अपना जग में ,
सोच , न जी पाता न मर पाता ,
छोटी सी उलझन उसको ,
दानव से विकराल लगे ,
रोजमर्रा की नाकामी भी ,
साक्षात उसको काल लगे ,
कुछ करने में असक्षम होता,
चिढ़ता खुद से , वो घबराता ,
अपना श्रेष्ठ देने पर भी ,
भयग्रसित हो पछताता ,
पतन के इस दौर में ,
जब अपनापन मिल जाता है,
प्रोत्साहन भरे , फिरे हाथ से ,
निरुत्साही भी खिल जाता है,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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