Tuesday, September 29, 2020

मीरा आर्ची चौहान की रचना- भयग्रस्त मन

रचयिता-मीरा आर्ची चौहान
जिला-कांकेर ,छग
शीर्षक-भयग्रस्त मन
विधा-कविता (छंद मुक्त)
अलंकार-अतिशयोक्ति अलंकार

भय ग्रस्त मन में सोचते ही रहता,
कभी परीक्षा में पेपर बिगड़ने का।

समय पर गंतव्य तक न पहुंचे तो,
बिल्ली के रास्ता काटने पर भ्रमित 

उल जलूल सोचते रहता है ये मन,
सपने में भी भयभीत होता है मन।

समय पर बारात न आने पर मन,
जाने कितना  डर जाता है मन।।

सांप का डर,कुछ खोने का डर,
बीमारी का डर,नाराजगी का डर 

सब डर से बढ़कर करोना का डर,
न घर से निकलना न चैन से रहना 

हर समय कुछ भी यूं सोचते रहना
करोना न होने पर भी होने का डर

मृत्यु की कल्पना कर सिसकना,
दहाड़ मारकर रोना फिर चीखना।

घर में खामोश हो कर सो जाना,
सपने में चिल्लाना  मुझे बचाओ।

ऊटपटांग हरकतें करते ही रहना,
बिना कारण यूं ही भयभीत रहना 

करोना -करोना कहकर चिल्लाना,
भय के कारण न आना न जाना ।

मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
_________________________
अतिशयोक्ति अलंकार-
करोना के भय का अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन ।
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