रचनाकार-एच-एस-अरमो "अरमान "
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विषय--"सड़क " ।
शीर्षक--"" डगर "" ।
विधा--छंद-मुक्त,कविता ।
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••••<<||~~《डगर》~~>>||••••
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सदियों से पथिकों को---
राहें दिखाती,
मील का पत्थर साबित हो--
हमें मंजिल तक पहुँचाती ।
उस भटके,इन्सान से पूछो--
जो भटक गया हो--
बीयाबान अनजान घने जंगल में,
उसे डगर की,खबर नहीं---
पर,बढ़ते अनजान पथ की ओर---
धैर्य और साहस से,बन जाती है,
आशाओं और सफलता की डगर ।
पहाड़ों में बनते दुर्गम पथ---
मजदूरों के,फौलादी हाथों से,
निखरती-सँवरती,इन्जीनियर सोच से,
आज आधुनिक मशीनों के प्रयोग ने,
आसान बना दी हैं,सड़क की राहें ।
धन्य ! वो वैज्ञानिक - - -
जिनकी खोज ने,दूरबीन हमें दी ,
सर्वे मशीन भी दी व अनेकों - - -
सड़क-निर्माण ,मशीनों की खोज की।
मुझे,डगर कहो या सड़क या पथ- - -
मैं एक मंजिल,किसी का मुकाम हूँ ,
"कोलकाता से पेशावर तक " ---
"ग्रांट ट्रंक रोड "का नाम,मैं हूँ ।
देश,राज्य,जिला,तहसील- - -
गाँव और शहरों का,
विकास हैं,ये सड़कें - -।
प्रधान-मंत्री ग्रामींण सड़क योजना--
जिसकी,एक मिशाल है ।
इसकी बानगी ने---
ग्रामीणों के,चेहरों में---
अपार मुस्कुराहट लाती है ।
उबड़-खाबड़ रास्तों को---
समतल बनातीं हैं,ये सड़कें ।
जिंदगी की,घुमावदार पथ की तरह,
होती हैं सड़कें----
अक्सर मोड़ पर,झुकी होती हैं ।
अभिकेंद्र-अपकेंद्र बलों का---
पाठ हैं,हमें सीखातीं ---
मानव जाति को,झुकने---
सम्हलने का,मूक संदेश देती है ।
मैं ! सड़क-पथ-डगर ,नाम है मेरा,
जीवन दर्शन,भावार्थ हूँ,मानव तेरा ।
चिंतन से,इसकी गुढ़ता समझ मेरा,
भवसागर तेरा,तर जायेगा ।
तू ! इस धरा में,नहीं रहेगा जब,
पर,तेरा निशान पथगामिनी बन---
तेरे बताये,राह को,दिखाते रहेगा ।
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व्याख्या--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जाति के लिए सड़क/डगर राह दिखा सकती है और जीवन दर्शन का पाठ भी पढ़ा सकती है ।
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