पता -------- कसडोल , छत्तीसगढ़
विषय------ सड़क
शीर्षक---- सड़क हूं मैं .........
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पहाड़ों में करती हूं अठखेलियां !
नदी , नहरें हैं मेरी सहेलियां !
आकर शहरों की चकाचौंध में ,
देखती हूं अनगिनत रंगरेलियां !
दूर तक संग - संग चलती हूं !
पटरियों से मिलने को मचलती हूं !
सहती हूं बाढ़ के लपेटे भी ,
सूरज की तपन में पिघलती हूं !
चली जाती हूं मैं समंदर के पार भी !
चढ़ जाती हूं ऊंचे पर्वत , पहाड़ भी !
मंजिल तक ले जाना धर्म है मेरा ,
मेरे अज़ीज़ अमीर-गरीब , लाचार भी !
रक्तरंजित होती राह हूं मैं !
असामयिक मौतों का गवाह हूं मैं !
मेरा भी ह्रदय है ममतामयी ,
यायावरी जीवन का पनाह हूं मैं !
दुख नहीं जब , मेरी परतें हटती है !
सह लेती हूं दर्द , मेरा सौंदर्य घटती है !
पर रोक नहीं पाती हूं अपने आंसू मैं ,
मेरे नाम पर जब हरे-भरे पेड़ कटती है !
नाज़ुक है मन मेरा ,
दिखने में कड़क हूं मैं .....
न थमती हूं , न रूकती हूं ,
स्थिर हूं मगर ,
निरंतर चलती हूं !
क्योंकि सड़क हूं मैं .........
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