रचनाकारा :-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,जिला-कांकेर (छ.ग.)
विषय :- नदी (छंदमुक्त)
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कल-कल,छल-छल बहती
दरिया जीवन का राग सुनाती है,
बूंदों से अपना स्वरूप गढ़कर
नदीआगे बढ़ना सिखाती है।
राहों में अनगढ़ पत्थर,दुर्गम
बहुत पर हिम्मत ना हारती है,
गिरि, गह्वर, में खोद सुरंग
चलती आगे बढ़ती बलखाती है।
विपदाओं में भी खलबल कर
नव जीवन का राह दिखाती,
संयम और धैर्य लिए मुस्कुराती
पथ पर बढ़ने का पाठ सिखाती है।
कभी ना थकती,
हौसला लिए आगे बढ़ती,
राहें लंबी पर थकन छू न पाती,
कभी इधर -उधर किसी मोड़
पर वो रुक ना पाती है।
जब तक चलना है नदी चलती रहती
अंत में सागर की गोद समाती,
सागर से मिलकर लक्ष्य
और सदगति पाती है।
*व्याख्या*:-प्रस्तुत कविता में नदी निरन्तर
बहती रहती है।सारी विपदाओं
को पार कर लोगों को आगे बढ़ना
सिखाती है।संयम और धैर्य के साथ
नवजीवन का पाठ पढ़ाती,और
अंत में सागर में मिल जाती है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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