Monday, September 21, 2020

नलिनी बाजपेयी जी की रचना- नदी

रचनाकारा :-नलिनी बाजपेयी
        संबलपुर,जिला-कांकेर (छ.ग.)
   विषय :- नदी (छंदमुक्त)
    
~~~~~~~~~~~~~~~

कल-कल,छल-छल बहती 
दरिया जीवन का राग सुनाती है,
बूंदों से अपना स्वरूप गढ़कर 
नदीआगे बढ़ना सिखाती है।

राहों में अनगढ़ पत्थर,दुर्गम 
बहुत पर हिम्मत ना हारती है,
गिरि, गह्वर, में खोद सुरंग 
चलती आगे बढ़ती बलखाती है।

विपदाओं में भी खलबल कर 
नव जीवन का राह दिखाती,
संयम और धैर्य लिए मुस्कुराती 
पथ पर बढ़ने का पाठ सिखाती है।

कभी ना थकती,
हौसला लिए आगे बढ़ती,
राहें लंबी पर थकन छू न पाती,
कभी इधर -उधर किसी मोड़ 
पर वो रुक ना पाती है।

जब तक चलना है नदी चलती रहती 
अंत में सागर की गोद समाती,
सागर से मिलकर लक्ष्य 
और सदगति पाती है।

*व्याख्या*:-प्रस्तुत कविता में नदी निरन्तर 
         बहती रहती है।सारी विपदाओं 
         को पार कर लोगों को आगे बढ़ना 
         सिखाती है।संयम और धैर्य के साथ 
         नवजीवन का पाठ पढ़ाती,और 
         अंत में सागर में मिल जाती है।

       नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...