रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा - मुक्त
शीर्षक -
*मैं नदी*
बहती
मैं निर्झरणी
बाधायें पार करती
अविरल अवरुद्ध
तटिनी ।
फैलाये
स्वच्छ आँचल
चट्टानों से टकराती
कंकड़ पत्थर
समेंटती ।
ऊर्जा
मुझमें अपार
रुकना नहीं चाहे
आये बाधायें
हज़ार ।
उद्गम
हिमाचल गोद
बहती पर्वत पठार
बनाती उपजाऊ
मैदान ।
अंत
मेरा अजीब
बाँटकर मीठा जल
खारे में
समाना ।
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(खारे में- समुद्र)
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