जिला - बलौदाबाजार ( छ .ग . )
विषय - अद्वितीय सच
विधा - लघुकथा सृजन
शीर्षक - अद्वितीय सच
पन्द्रह साल का मनोज जब दसवीं में था , उनकी दादी का स्वर्गवास हो गया । पूरे घर मे मातम छा गया । सारे मोहल्ले वासी सांत्वना देने व शोक व्यक्त करने हेतु आने लगे । श्मशान यात्रा में अर्थी को कंधा देने मनोज भी गया । वह बड़ा होशियार एवं विवेकशील विद्यार्थी था ।
मुक्ति धाम में जाकर मनोज ने देखा कि गाँव एवं बाहर के भी बड़ी संख्या में लोग उनकी दादी के अंत्येष्टि क्रिया में आये हुए हैं । किन्तु वहाँ का माहौल देखकर मनोज किसी और ही चिंतन में खो गया ।
कोई कह रहा है - अरे भाई , जल्दी करो मुझे दुकान पर जाना है । कोई कहता - हाँ , इस लकड़ी को ठीक से रखो और इधर से जल्दी आग लगाओ । शूट - बूट पहने कोई साहब जैसे आदमी कहता है - मुझे दस बजे ऑफिस पहुँचना है । बहुत जरूरी काम है । जल्दी - जल्दी निपटाओ जी । अन्य लोग सलाह - सूचना दे रहे है । कोई नेतागिरी कर रहा है । कई लोग गपशप लड़ा रहे हैं । कुछ लोग बीड़ी - सिगरेट फूँक रहे हैं तो कुछ लोग खेती - बाड़ी की चर्चा में मग्न हैं । कुछ बुद्धिमान और वी आई पी लोग राजनीति व देश - दुनिया की बातों में व्यस्त हैं । मतलब दो - चार घरेलू व्यक्तियों को छोड़कर सब बड़े जल्दी में हैं । किसी के पास टाइम नहीं है ।
पण्डित जी से कथा में मनोज ने सुना था कि श्मशान भूमि में ज्ञान व वैराग्य का निवास होता है और हमारा मन अनायास ही भगवान की भक्ति में लग जाता है । लेकिन वहाँ का माहौल देखकर मनोज को धक्का लगा । जिस जगह शरीर व संसार की नश्वरता एवं असारता का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए वहाँ लोग बेचारे भगवान को पीठ देकर मायावी प्रपंच में फँसे हुए हैं । मृत्यु जैसे अकाट्य एवं अद्वितीय सत्य को लोग कैसे झुठला रहे हैं । हम भी इसी प्रकार मौत के मुख में चले जायेंगे । इस बात को लोग समझते क्यों नहीं ? जानकर भी अनजान हो रहे हैं । शास्त्र और सत्संग की बातों का किसी को कोई परवाह ही नहीं है ।
मनोज अपना शोक भूलकर गम्भीर मुद्रा में बैठा है और एक दार्शनिक चिंतन में खोया हुआ है - मृत्यु से अनजान होना भी मृत्यु के समान एक अद्वितीय सच है क्या ?
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