रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
विषय :- नदी
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- नदियाँ
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कल - कल बहती प्यारी नदियाँ,
जग की प्यास बुझाती हैं।
पर बदले में सोंचो मनवा,
खुद वह क्या - क्या पाती है?
बहती नदी के तन को चीरकर,
मानव नहर बनाता है।
स्वार्थ सिद्ध करने को अपने,
हर हथकंडा अपनाता है।
नदी हमारी मैया कहकर,
मनवा निश - दिन कहता है।
पर अक्सर नदी प्रदूषण में,
कब वह पीछे रहता है?
देख दशा दुनिया में नद की,
मन विचलित हो उठता है।
जीवन दायिनी की देख दशा,
सृष्टि कर्ता भी रोता है।
पाठ पढ़ाती परोपकार की,
नित बढ़ते रहना सिखाती है।
लक्ष्यप्राप्ति को तत्पर चलती,
जिज्ञासा जगलाती है।
दर्द दिया है लाखों मनु ने,
पर सदा ही उसने उपकार किया।
कुकर्मों के बाद मनुज के,
हरदम ही उपहार दिया।
अरे मनुज यूँ सठ ना बन,
अब भी समय है सुधर जा।
माँ नदियाँ को घायल करता,
ना अपने हद से गुजर जा।
नदियाँ देगी निर्मल जल व,
उपजाऊ सदा माटी देगी।
गर उसका भी मान रखेगा,
सुगम तुम्हें परिपाटी देगी।
कल- कल जब अविरल बहेगी,
फिर नदियों में अमृता धारा।
मानव जीवन संग प्रकृति के,
लगने लगेगा फिर से प्यारा।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने नदियों की महत्ता का वर्णन किया है साथ ही मानव कर्म से नदियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का भी जिक्र किया है। अंत में रचनाकार ने नदियों को साफ व सुरक्षित रखने का आव्हान किया है।
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