Friday, September 11, 2020

बलौदाबाजार से लीलाधर कुम्हार की रचना- अंधविश्वास

रचनाकार -  लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - निदर्शना अलंकार
शीर्षक - अंधविश्वास 
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बिना जाने बिना समझे ,
लोग करते हैं उपहास ।
लोकरीति व परम्पराएँ ,
आज का अंधविश्वास ।।

मूर्ति - पूजा श्राद्ध - तर्पण ,
गीता रामायण वेद पुराण ।
इनके पीछे छिपा हुआ है ,
एक पूर्ण गहरा विज्ञान ।।

कुछ अच्छी कुछ बुरी प्रथायें ,
हर धर्म - समाज मे होती हैं ।
एक ही चश्मा से सबको देखना,
क्या सही यह नीति है ??

धर्म संस्कृति लोकाचार ,
 समाज - वृक्ष के मूल हैं ।
अंधश्रद्धा की आड़ में ,
आम को कहते बबूल हैं ।।

मानना जानना और करना ,
श्रद्धा और विश्वास सहित ।
जीवन का यह मंत्र महान ,
वाद - विवाद कुतर्क रहित ।।

अंधश्रद्धा ही सच्ची श्रद्धा ,
अंधविश्वास ही पक्का विश्वास ।
अपने धर्म शास्त्र संत ईश्वर ,
क्या इनका भी करें मजाक ??

वास्तव में जो कुरीति है ,
व्यर्थ और हानिकारक ।
उनसे बचें बचायें सबको ,
सर्व विकास - पथ के बाधक ।।

जन्म मृत्यु और ग्रहण के नियम ,
गंगा  स्नान   व्रत -पूजा ।
वेद - रीति शास्त्रोक्त क्रियाएँ ,
सत्य वही मान्य नहीं दूजा ।।

खाली घड़ा और विधवा दर्शन ,
बिल्ली रास्ता काट जाये ।
सफेद साड़ी काला कपड़ा ,
 समाज मे अपशकुन कहाये।।

महिलाओं के खुले बाल ,
''पीरियड्स'' का वह दौर ।
भूत - प्रेत और मैली विद्या ,
अंधविश्वास का ठौर ।।

लेकिन शास्त्रीय और वैज्ञानिक ,
नियम गलत नही होते ।
देश काल स्थिति अनुसार ,
मानो जानो वहम छोड़ते ।।

धर्मनिष्ठ पुरुषार्थी मानव ,
मनगढ़ंत जाल में नहीं फँसते ।
लेते प्रभु का पावन नाम ,
जो सकल अमंगल हर लेते ।।

सत्य धर्म विज्ञान की सबको ,
मिले  समन्वित  शिक्षा ।
मन का भ्रम निकल जायेगा ,
मिलेगा विवेक व सही दिशा ।।

इस कोरोना के काल में ,
प्राचीन प्रथा भी पालनीय है ।
केवल फैशन ही समाज में ,
नहीं सदा वांछनीय है ।।

श्रद्धा और विश्वास का ,
दुरुपयोग नहीं करना है ।
देश धर्म की वेदी पर ,
आहुति बन चढ़ना है ।।

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