जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - निदर्शना अलंकार
शीर्षक - अंधविश्वास
*************************
बिना जाने बिना समझे ,
लोग करते हैं उपहास ।
लोकरीति व परम्पराएँ ,
आज का अंधविश्वास ।।
मूर्ति - पूजा श्राद्ध - तर्पण ,
गीता रामायण वेद पुराण ।
इनके पीछे छिपा हुआ है ,
एक पूर्ण गहरा विज्ञान ।।
कुछ अच्छी कुछ बुरी प्रथायें ,
हर धर्म - समाज मे होती हैं ।
एक ही चश्मा से सबको देखना,
क्या सही यह नीति है ??
धर्म संस्कृति लोकाचार ,
समाज - वृक्ष के मूल हैं ।
अंधश्रद्धा की आड़ में ,
आम को कहते बबूल हैं ।।
मानना जानना और करना ,
श्रद्धा और विश्वास सहित ।
जीवन का यह मंत्र महान ,
वाद - विवाद कुतर्क रहित ।।
अंधश्रद्धा ही सच्ची श्रद्धा ,
अंधविश्वास ही पक्का विश्वास ।
अपने धर्म शास्त्र संत ईश्वर ,
क्या इनका भी करें मजाक ??
वास्तव में जो कुरीति है ,
व्यर्थ और हानिकारक ।
उनसे बचें बचायें सबको ,
सर्व विकास - पथ के बाधक ।।
जन्म मृत्यु और ग्रहण के नियम ,
गंगा स्नान व्रत -पूजा ।
वेद - रीति शास्त्रोक्त क्रियाएँ ,
सत्य वही मान्य नहीं दूजा ।।
खाली घड़ा और विधवा दर्शन ,
बिल्ली रास्ता काट जाये ।
सफेद साड़ी काला कपड़ा ,
समाज मे अपशकुन कहाये।।
महिलाओं के खुले बाल ,
''पीरियड्स'' का वह दौर ।
भूत - प्रेत और मैली विद्या ,
अंधविश्वास का ठौर ।।
लेकिन शास्त्रीय और वैज्ञानिक ,
नियम गलत नही होते ।
देश काल स्थिति अनुसार ,
मानो जानो वहम छोड़ते ।।
धर्मनिष्ठ पुरुषार्थी मानव ,
मनगढ़ंत जाल में नहीं फँसते ।
लेते प्रभु का पावन नाम ,
जो सकल अमंगल हर लेते ।।
सत्य धर्म विज्ञान की सबको ,
मिले समन्वित शिक्षा ।
मन का भ्रम निकल जायेगा ,
मिलेगा विवेक व सही दिशा ।।
इस कोरोना के काल में ,
प्राचीन प्रथा भी पालनीय है ।
केवल फैशन ही समाज में ,
नहीं सदा वांछनीय है ।।
श्रद्धा और विश्वास का ,
दुरुपयोग नहीं करना है ।
देश धर्म की वेदी पर ,
आहुति बन चढ़ना है ।।
---#---#---#---
No comments:
Post a Comment