Friday, September 11, 2020

महासमुंद से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- अपशगुन

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- अंधविश्वास
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- क्या इतना अपशकुन होता है?
अलंकार :- निदर्शना अलंकार।

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लौट आना बीच राह से,
ज्यों खाना गले तक ले उगल देना।
क्या इतना अपशकुन होता है?
बिल्ली का रस्ता काट लेना।
                मोड़ लेना मुख, भौंहें सिकोड़ना,
                देखे जैसे कोई दृश्य घृणित।
                क्या इतना अपशकुन होता है?
                 बांज व विधवाओं का दिखना।
कोसना, खरी खोटी सुनाना,
कत्ल सा अपराध का बोध दिलाना,
क्या इतना अपशकुन होता है?
राहों में खाली घड़े का आ जाना।
                 पुकारे कोई पीछे से हमें,
                 काम से बाहर जाते समय।
                 बज्र सा उसपर बरस पड़ना,
                 क्या इतना अपशकुन होता है?
                 किसी का पीछे से आवाज देना।
अंधविश्वास के जाल में फंसे,
ज्यों फड़फड़ाते हो कोई मीन।
क्या एक पल को भी सकारात्मक सोच नहीं है?
कैसे अपशकुन बना देता हमें दीन - हीन।

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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने मानव जीवन में पनपे उन अंधविश्वास भरे अपशकुनो का वर्णन करते हुए उनपर कटाक्ष करने का प्रयास किया है।
साथ ही काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने निदर्शना अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।

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