स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा-मुक्त ,उदाहरण अलंकार
शीर्षक- *मनचला भंवरा*
एक कली थी शरमायी सी,
मंडराता एक भंवरा आस-पास,
मधुर धुन में करता गुंजन,
फूल को भी था यह एहसास।
मन की बात रही अनकही,
कह ना पाये एक दूजे से कभी
गुजरता गया समय भी ऐसे,
तितली से पंख लगे हों जैसे।
एक झोंका ऐसा आया हवा का,
मानों किस्मत ने ही करवट बदली,
भंवरे ने गुलशन ही बदल लिया
फितरत अपनी वो दिखा गया।
कली भी अब तो फूल बनी,
चली परदेश पिया की गली
नवजीवन नये साथी मिले,
चमन में दो सुंदर पुष्प खिले।
कहते हैं यह दुनिया गोल,
जिसका कोई ओर ना छोर,
फूल-फूल मंडराता भ्रमर
पहुंचा बिसरी कली के पास।
शिकायत जैसे बेजुबान हुई,
चेहरे में दोनों के मुस्कान खिली,
चलता रहा बातों का दौर,पर
दोनों का था अब अलग ही ठौर।
पुष्प ने तब कहीं नहीं, भंवरे ने कब किया प्रयास
उम्र के इस पड़ाव में, अब हो कैसी आस
मधुर रहे संबंध ,हो ना हो मिलन
पर जीवन मे रहता है हरदम, एक 'काश' ।।
अनुरमा शुक्ला
दुर्ग (छ.ग.)
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