विषय :- भ्रमर
शीर्षक :- भ्रमर सा कुरीति चूसे समाज को
अलंकार :- उदाहरण अलंकार
जैसे सुमन को चूसे भ्रमर ,कुरीति चूसे समाज को |
भिन्न भिन्न के रूप धर ,
बिगाड़े कल और आज को |
कर्मनिष्ट अब कोई नहीं ,पैसे से तोलें हर काज को
स्वार्थ से ठोकर मार ,रहे मानवता के ताज को |
जैसे सुमन को चूसे ,भ्रमर कुरीति चूसे समाज को |
प्रकृति का कर विनाश ,मैला कर धरती आकाश |
नशे की लत में फसा युवा ,कौन करे देश विकाश
भक्ति पाखंड बना है ,टूट रहा विश्वास |
जहाँ नारी देवी सम ,वहां बन रहा उपहास |
राम ,श्रवण की भूमि पर,
पुत्र से मात पिता निराश |
स्वयं ही मानव दूध पीला
रहा ,काल रूपी नाग को |
जैसे सुमन को चूसे भ्रमर ,कुरीति चूसे समाज को |
आतंगवाद की आग ने ,विकाश के बेसुरे राग ने |
पैसे कमाने की भागम भाग ने ,अब नहीं कोई प्रेम अनुराग में |
कलियाँ मुरझाई प्रफुल्लित बाग़ में, विषधर बैठे मार कुंडली चन्दन की शाख में |
जब अपने खुद ही मात दें ,कैसे ,तोड़ें फिर शतरंज की बिसात को |
जैसे सुमन को चूसे भ्रमर, कुरीति चूसे समाज को |
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