पता- कोरिया, छत्तीसगढ़
विधा- छन्द मुक्त कविता
विषय- सडक़
शीर्षक- गाथा सडक़ की
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हे पथिक!मैं सड़क हूं, कुरूप और कुरंग ।
समझना जो हो मुझे ,चलो मेरे संग ।।
कैसी मेरी संरचना? कैसी मेरी बनावट?
मिट्टी पत्थर डामर की, है मुझमें मिलावट ।।
स्वभाव नितांत मेरा ,निश्चल, निष्पक्ष,निस्वार्थ ।
एक कर्तव्य एक धर्म, परमार्थ, परमार्थ, परमार्थ ।।
कहीं छोटी सी, कहीं अति विस्तार में हूं ।
निश्चित ही महत्वपूर्ण, इस बड़े संसार में हूं ।।
जुड़ता मुझसे शहर-शहर, जुड़ता गांव- गांव ।
चलता कोई लेकर सवारी, कोई अपने पांव ।।
गंतव्य तक जाने का, मैं ही सुलभ माध्यम ।
हो मानव मात्र या, वस्तु भारी भरकम ।।
सरल और संभव होता, मुझसे आवागमन ।
चाहो तो इस कार्य निमित्त, कर लो मुझको नमन ।।
अच्छे स्वास्थ्य में अपने, सबको आनंद दायक हूं ।
अन्यथा जग विदित है, कितनी कष्ट कारक हूं ।।
नित्य प्रति रखना, मेरा रखरखाव ।
दे सकती हूं वरना, तुमको गहरे घाव ।।
मुझ पर चलने के हैं, कुछ एक नियम ।
मानता न जब कोई, आ जाते हैं यम ।।
इतिहास के पन्नों पर, मान-सम्मान मेरा भी है ।
जी हां! जगतोत्थान में, अल्प योगदान मेरा भी है ।।
-बिजेन्द्र अहीर
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