स्थान- रायगढ़,छत्तीसगढ़
विधा- मुक्त काव्य
विषय-सड़क
शीर्षक- सड़क
==== *सड़क* =====
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खुली सड़के बुला रही है,भटके राही को रुला रही है।
मंजिल मिल गई उन्हें जो हारा नही,थकने वालो को सुला रही है।।
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सड़के चारो ओर है,कोलाहल और शोर है।
मंजिल का ठिकाना नही,अनजाना सा छोर है।।
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सड़कें भूल भुलैया का फसाना है,अनसुलझा सा पैमाना है।
कई चौराहे मिलेंगे सफर में,हर कदम सोच कर बढाना है।।
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राह कौन सी सही है,हर अनुभव ने कही है।
पद चिन्हों की थाह नाप ले,जो खून ठोकरों में बही है।।
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हर सड़कों पर मुकाम है,कहीं पर बदनामी तो कहीं पर नाम है।
चुनौती तेरी अपनी है,चलते कदमो पर तेरा लगाम है।।
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राह छोटा गम्भीर है,कंकड़ पर चलता वीर है।
लक्ष्य साधकर जो चलता है,मंजिल उसके तकदीर है।।
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राह सद्कर्मों से हो कल्याण,मिलता मोक्ष मुक्तिधाम।
पाप के राह की नियति,देता सदा दुष्परिणाम।।
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सड़कें वही पुराना है,सबका आना जाना है।
दुनिया उसे ही याद रखेगी,जिसने सही सड़क पहचाना है।।
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मौलिक रचना
अजय पटनायक
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वाह 👌
ReplyDeleteVery nice 👍
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