स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"माँ"
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ममता लुटाने की मूरत हो तुम
प्यार देने की सीरत हो तुम
पालने में सुलाती लोरी हो तुम
खाना की पहली कौर हो तुम
दुनिया की पहली गुरु हो तुम
दुनिया कहती देवी हो तुम
रचयिता की पहली शब्द हो तुम
चित्रकार की पहली आकृति हो तुम
संगीत की पहली सूर हो तुम
सुंदरता की पहली हूर हो तुम
ईश्वर की पहली वरदान हो तुम
शक्ति रुपी दुर्गा हो तुम
डांटती फटकारती सीख हो तुम
घर की आंगन की क्यारी हो तुम
बच्चों के जीवन की तार हो तुम
मन के मुस्कान की खुशी हो तुम
पिता के विश्वास की अर्धांगिनी हो तुम
घर को चलाने की ऊर्जा हो तुम
तुमसे ही संसार की माया
तुमसे ही सारे जगत की काया
तुम्हारे आंचल में सृष्टि ने आश्रय पाया
तुम्हारी बखान अधूरी ही रहेगी
महानता की अथाह सागर हो तुम
"मां" हो तुम, मां सारा जहाँ हो तुम
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