जिला- कांकेर,छग
शीर्षक-बुनकरों की व्यथा
विध़ा-कविता (मुक्त छंद)
अलंकार-वाक्यार्थोपमा अलंकार
कांकेर के सरंगपाल गांव में,
देखा मैं ने बुनकर मेहनती
रेशे- रेशे को बुनते हुए|
ज्यों बुनती है बया चिड़िया
बच्चों के लिए सुंदर घोसला
तिनके-तिनके पल में जोड़|
कई दिनों तक भूखे-प्यासे रह
सुंदर अपनी कला को उकेरता
पर अब बाजार में सब व्यर्थ|
मशीन की कारीगरी ही भाती,
आज के शाही खरीददारों को,
बेचारा दो रोटी को तरसता|
कला का प्रदर्शन धरा रह जाता,
सपने चूर -चूर हो जाते ज्यों
घड़ा टूटने पर प्यासा रहता मनु|
कपड़े जो बुनता है वह आज
भूखा है दुख की छतरी लिए,
कारीगरी करना ज्यों जुल्म हो|
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वाक्यार्थोपमा अलंकार-
1-ज्यों बुनती बया चिड़िया घोसला|
2-ज्यों घड़ा टूटने पर प्यासा रहता मनु|
3-कारीगरी करना ज्यों जुल्म हो|
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