Tuesday, September 15, 2020

महासमुंद से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- बुनकर

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- बुनकरों की व्यथा
शीर्षक :- आधुनिकता व बुनकर
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- वाक्यार्थोपमा अलंकार

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करते हैं परिश्रम कड़ी,
रेशे - रेशे को चुनकर।
करते हैं तैयार वसन वे,
कच्चे धागों को बुनकर।
बुनते हैं वे जग के सपने,
जैसे पंछी बुनते बसेरा।
रक्त - स्वेद निज एक करे,
क्या रैन? और क्या है सवेरा?
कल की ही तो बात है ये,
बुनकर के हाथों में था जादू।
जब से आए कल - कारखाने,
बस कल निर्मित का मन में काबू।
हासिए पर रख दिया बुनकर को,
ज्यों पन्नों में छोड़े हासिया।
यंत्र - तंत्र ने आकर जग में,
बुनकर दल का चैन ले लिया।
ऊपर से वस्त्रों पर कर का,
पड़ रहा है काम में विपरित असर।
टूटे - बिखरे मनोबल उनका,
ज्यों बिखरे मोती माला से टूटकर।
कुछ छोड़ रहे अपनी विरासत,
कुछ ने दुख में दुनिया छोड़ी।
आधुनिकता ने खदेड़ा ऐसे,
मानों किसी ने कान मरोड़ी।
बेरोजगार हुए कई बुनकर,
हालातों से हारकर।
बिल्कुल न छोड़ा राह कोई भी,
किया बेहाल वार कर।
अब तो विरले ही दिखते हैं,
चरखा चलाते जग में बुनकर।
जैसे शाम हुई जीवन में,
डूब गया हो जग में दिनकर।

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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने आधुनिकता के दौर में परंपरागत व्यवसाय में संलिप्त बुनकरों की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा है कि धीरे-धीरे बुनकर हासिए में जा रहें हैं, जिससे की हमारी सांस्कृतिक विरासत पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने वाक्यार्थोपमा अलंकार के प्रयोग का प्रयास किया है।

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