जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विषय - बुनकरों की व्यथा
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - वाक्यार्थोपमा अलंकार
शीर्षक - बुनकर - व्यथा
बुनकर मोची लोहार कुम्हार ,
सभी समाज के काश्तकार ।
किन्तु मशीनी उत्पाद के कारण ,
चौपट हुए इनके रोजगार ।।
बड़ी - बड़ी नदियों के आगे ,
ज्यों कुआँ - झरना निरर्थक ।
वैसे ही बुनकर बेचारे ,
आज कपड़ा मिलों के समक्ष ।।
सुन्दर सस्ता और टिकाऊ ,
मिल के कपड़े एकदम फाइन ।
तेजी से भारी उत्पादन ,
मार्केट में ग्राहकों की लाइन ।।
बुनकर लोग सारे परिवार ,
मिलकर कपड़ा बुनते हैं ।
सबकी रोजी - रोटी व्यवस्थित ,
हँसी - खुशी से रहते हैं ।।
लेकिन मोटा खादी कपड़ा ,
सूती का लुगड़ा इलियास ।
बाजारों में मांग नहीं है ,
बुनकरों की बिगड़ी हालात ।।
आज का यह वैज्ञानिक युग ,
छीन लिए हाथों के काम ।
जैसे स्टील प्लास्टिक बर्तन ,
मृदा पात्र का लिए स्थान ।।
समाज का तन ढँकने वाले ,
बुनकर बड़े व्यथित हैं ।
पुश्तैनी धंधा - व्यवसाय ,
फिर भी निर्धन - श्रमिक हैं ।।
गाँधी जी की चरखा जो ,
बुनकरों का जीवन है ।
आजादी का पर्याय कभी ,
कोने में करती क्रन्दन है ।।
कोसा खादी सूती कपड़ा ,
स्वदेशी लोकल अपनाओ ।
देश की आर्थिक विकास हेतु ,
बुनकरों को आगे बढ़ाओ ।।
बुनकर सहित सभी काश्तकार ,
चाहते हैं सरकारी मदद ।
यथा सूख रही खेतों को ,
खाद और पानी की जरूरत ।।
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वाक्यार्थोपमा अलंकार -
1 - ज्यों कुआँ - झरना निरर्थक
2 - जैसे स्टील प्लास्टिक बर्तन
3 - यथा सूख रही खेतों को
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