जिला :- महासमुंद
विषय :- शांति चेतना
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- शांत चेतना की तलाश।
अलंकार :- दृष्टांत अलंकार।
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शांत चेतना की तलाश है,
ज्यों मृग खोजे कस्तूरी।
निज उर में ही है बसी,
जग में ढूंढ़े, हो बावरी।
जितना ढूंढ़े जग में मनवा,
उतना अशांति विस्तार होगा।
एकाग्रता से जो झांके निज में,
शांत चेतना का उद्गार होगा।
असंतुष्ट यहां हर जन मन है,
पर असंतुष्ट तो निज का मन है।
मीन सोचे भला है मानव जीवन,
मानव समझे श्रेष्ठ मीन का जीवन है।
आत्मसंतुष्टि एक मात्र मार्ग है,
मिलती जिससे शांत चेतना।
असंतुष्टि से ही जग में,
भरी हुई है वेदना।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन में शांत चेतना के महत्व को प्रकाशित करते हुए उससे प्राप्ति का मार्ग बताया है।
काव्य अलंकरण के लिए दृष्टांत अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।
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