Thursday, September 3, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- शांति चेतना

*रचनाकार -  संतराम कुम्हार* 
   *जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.)* 
   *शीर्षक  -  " शांति चेतना  "* 
     *विधा - छंदमुक्त कविता* 
 *अलंकार - दृष्टांत अलंकार* 
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अग्नि की ज्वलंत ज्वाला, 
जल से बुझ जाती है। 
मन की वेदना प्रभु दर्शन से, 
शांति का शरण पाती है।।1।।

चार दिन की ये मोह माया, 
मिट्टी में ही मिल जानी है। 
ध्यान कर ले तू हरि चरण में, 
नश्वर ये जिंदगानी है।।2।।

आत्म और ईश्वर के मिलन से, 
असीम सुख तू पायेगा। 
नइया पार हो जायेगा बंदे, 
जब पानी में चीनी सा घूल जायेगा।।3।।

मन के आईने में तू झाँक, 
प्रभु भक्ति क्यों परित्याग रहा। 
कस्तूरी की तलाश में मृग सा, 
इधर-उधर क्यों भाग रहा।।4।। 

लाख कमा ले धन और दौलत, 
शांति कहीं न पायेगा। 
रंग ले खुद को भक्ति के रंग में, 
परम धाम को जायेगा।।5।। 

जिसको कहता तू अपना-अपना, 
सब रिश्ते स्वार्थ के गुलाम हैं। 
माता-पिता का ही बस प्रेम अनूठा, 
जिनके पद कमल में बसता चारो धाम हैं।।6।। 

फिरता तू भौतिक सुखों के पीछे,
आध्यात्मिकता से दूर होते जा रहा। 
शांति का बगवान खिला तेरे समीप, 
तू क्यों रेगिस्तान में मन लगा रहा।।7।। 

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 *दृष्टांत अलंकार का प्रयोग* :-
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1. अग्नि जैसे जल से बुझ जाती है ठीक वैसे भक्त का  हृदय प्रभु दर्शन से शांत हो जाती है। 

3. पानी में चीनी जैसे पूरी तरह घूल जाता है ठीक वैसे आत्मा का ईश्वर से मिलन होना चाहिए। 

4. हरि को बाहर तू ऐसे खोज रहा मानव जैसे कस्तूरी को मृग ढूंढता है। 
                                      
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2 comments:

  1. सच है मामा जी ये पूरा संसार सब मोह माया का जाल है??

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