जिला :- महासमुन्द
विषय :- भावी सुबह
शीर्षक :- जाने कब होगी नई सुबह?
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- अन्योक्ति अलंकार
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छाई काली घनघोर निशा,
दिखे ना राही पथ में दिशा।
जाने खिलेगी रवि किरण कब?
जाने कब होगी नई सुबह?
कह गए हमारे बड़े बुजुर्ग,
पतन से नष्ट होते हैं दुर्ग।
निश्चित है एक दिन फूल का मुर्झाना,
फिर घमण्ड करें क्यों दीवाना?
मन में लक्ष्य का प्रयास लिए,
भावी सुबह की आस लिए।
कब होगी खुशी से मन भाव विभोर,
जाने कब होगी नई भोर।
गहरे तमस से राह दिखे ना,
समस्या का उपाय सुझे ना।
कब जलेगा आस का दीपक,
कब होगा जग में उजियारा।
कुछ कर गुजरने की है चाहत,
पर अंधियारे से हम आहत।
कब फैले उम्मीदों की रौशनी?
जाने कब होगी नई सुबह?
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने यह प्रश्न किया है कि जाने कब सुबह हो? प्रकृति के नजरिए से देखें तो यह रात के बीत जाने के बाद होने वाली प्राकृतिक परिवर्तन है। वहीं मानव जीवन के परिप्रेक्ष्य में देखें तो प्रतिकूल परिस्थिति रूपी रात के बीत जाने के बाद अनुकूल परिस्थिति रूपी सुबह के होने की बात कही है।
रचनाकार ने अन्योक्ति अलंकार के प्रयोग का प्रयास किया है।
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