जिला-कांकेर, छग
विषय-भावी सुबह
शीर्षक- नई सुबह
अलंकार-अन्योक्ति अलंकार
विधा -मुक्त छंद
ऐ जिन्दगी! तुम्हारे इंतजार में
जाने कितने ताने बाने बुने थे|
जब तुम मिले तो लगा था कि
आशियाने में फूल खिलेंगे अब|
पर पतझड़ को तो आना ही था,
आजमाने मेरे हौसले की बुलंदी|
अग्नि परीक्षा देनी ही थी अभी,
पर खरे सोने को और तपिश कैसी
कामयाबी के सितारों ने कहा कि
आजमाने दो जिंदगी को फलसफे
कर्मठता वो छैनी हैं जिसने सभी
पत्थर को मूर्ति बनाई तराश कर||
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर ,छग
_________________________
अन्योक्ति अलंकार-
1-खरे सोने को तपिश कैसी|
2-पत्थर को मूर्ति बनाई तराश कर|
_____,,,,,,,,,,,_____,,,,,,,,,,,,_____
शानदार अभिव्यक्ति
ReplyDelete