पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
शीर्षक - भावी सुबह कैसा होगा ?
भावी सुबह कैसा होगा?
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कैसे बचें तीतर-बटेर ?
जब गिद्धों की भरमार है ,
उड़ न पाए क्या दोष उनकी?
या पंजो में धार है ,
हुनरमंद जमाने में ,
अपनो की हुनर बस दिखता है,
बिकते देखें सामान सभी ,
पर ईमान यहां अब बिकता है ,
एक ओर उत्सव तमाशे ,
एक ओर मातम पसरा ,
कोई चाहे एकाकी जीवन ,
कोई जीने का आसरा ,
भावी सुबह भयंकर होगा ,
जब सोच पड़ा बीमार है ,
झूठ जीतता पल-पल जग में ,
सच की होती हार है,
मरे पड़े पड़ोसी अपना ,
पर कान खड़े न होते हैं ,
कभी जग रोता था एकजन को ,
अब अपनो के लिए न रोते हैं ,
कभी काल छा जाता है ,
कभी अपनों का जंजाल है,
तृष्णा लूट रही तन-मन को ,
तभी स्थिति विकराल है ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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