स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त, विरोधाभास अलंकार,
शीर्षक- रोजगार
खेतों में फसल रुपी सोना उपजाते हैं किसान,
जरुरतें कम और खुशहाल रहता जीवन,
गाँवों के बच्चे अब होने लगे शिक्षित,
खोज रहें पढ़ लिखकर अपने लिये रोजगार,
आज के नौजवानों को शहरों की चकाचौंध है लुभाती,
भौतिक सुविधाओं की आस में बने महत्वाकांक्षी,
गाँव छोड़ नगरों कि ओर किये पलायन,
इस भागमभाग वाली भीड़ में हुये हैरान,
रोजगार ऐसी कि आमदनी रुपैया तो खर्चे हजार,
कैसे हो गुजारा पड़ रही हैं मँहगाई की मार,
रोजगार के लिये ये कैसी आपाधापी,
क्यों योग्यता नौकरी से ही आँकी जाती ?
देश के नेता रोजगार के नाम पर
राजनीतिक रोटियां सेंक रहे,
छल कर नौजवानों को लाखों पैसे ऐंठ रहे,
इससे तो भली थी इनकी खेती-किसानी,
घर के थे राजा, करते थे अपनी मनमानी,
लौट जाओ गाँव खेतों को बना दो, फिर उपजाऊ,
अन्न उपजाकर कर लो नौकरी इस धरा की ।।
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