रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय- रोजगार
शीर्षक- शिक्षित बेरोजगार
विधा- विरोधाभास अलंकार
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शिक्षित व्यक्ति, लाचार और बेरोजगार हैं
अनपढ़ लगाते हैं ठेले, घर में गुलजार हैं
पढ़े लिखे युवा दर-दर की ठोकरे खाते हैं,
अनपढ़ बूढ़े -बूढ़े लोग, देश को चलाते हैं
खेती के लिए,यहाँ कामगार नहीं मिलते हैं
डिग्रीलाल बेरोजगार हुये,निठल्ले फिरते हैं
इन अनपढ़ हाथों में, देखो कितना काम हैं
पढ़े लिखे युवाओं का ही बस काम तमाम हैं
वो पुलिया, सड़क, मकान सभी को बनाते हैं
इंजीनियर बेचारे घर बैठे हैं,वो कहाँ कमाते हैं
शिक्षा का गाँव गाँव में, जितना प्रसार हुए हैं
हर गाँव के युवा उतने ही, बेरोजगार हुए हैं
हाथों में कोई हुनर नहीं, डीग्री की भरमार हैं
ठाठ बाठ अंग्रेजों सा हैं, फिर भी बेरोजगार हैं
पैतृक काम भाता नहीं, नौकरी की दरकरार हैं
किस किस को मिले नौकरी, माँगते हजार हैं
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