जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग.)
विषय - रोजगार
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - विरोधाभास अलंकार
शीर्षक - स्वरोजगार
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// स्वरोजगार //
पहले एक कमाता था ,
खाते थे सब लोग ।
थोड़े में संतुष्ट सभी ,
सीमित खर्च उपभोग ।।
लेकिन समय बदल गया ,
सबको चाहिए काम ।
बेरोजगार की जिंदगी ,
दुःखदाई बदनाम ।।
जैसे - जैसे जनसंख्या ,
बढ़ती गई अपार ।
वैसे - वैसे समाज मे ,
कम हो गए रोजगार ।।
शिक्षा और सुविधा के साथ ,
बढ़ा नहीं व्यवसाय ।
बेरोजगारी से पीड़ित ,
युवा वर्ग समुदाय ।।
बड़ी-बड़ी फैक्ट्रीयाँ मशीनें ,
उत्पादन तो करती हैं ।
नौकरी धंधा स्वरोजगार ,
सबके पंख कुतरती है ।।
मैकाले की शिक्षा पद्धति ,
अंग्रेजी मानसिकता ।
भारत को इण्डिया बनाकर ,
दे दी गुलामी भिक्षा ।।
मजबूरी मे जिंदगी ,
घर - परिवार बेहाल ।
रोजी - रोटी के बिना ,
जनता कैसे खुशहाल ??
ज्यों - ज्यों भारत के नागरिक ,
स्वदेशी से दूर ।
त्यों - त्यों घटता गया रोजगार ,
हुए सभी मजबूर ।।
बड़ी - बड़ी डिग्री वाले ही ,
पाते हैं रोजगार ।
छोड़ दो ऐसी धारणा ,
करो कर्म से प्यार ।।
शिक्षित और अशिक्षित सारे ,
महिला पुरुष युवान ।
पैदा करो स्वयं रोजगार ,
सभी कर्म है एक समान ।।
डॉक्टर वकील इंजीनियर ,
शिक्षक और पटवारी ।
भागो मत इनके पीछे ,
कम्पीटिशन है भारी ।।
रोजगार की परिभाषा को ,
हमे बदलना होगा ।
अपनी कला - कौशल के सहारे ,
जीवन गढ़ना होगा ।।
सब्जी ठेला गुपचुप - चाट ,
चाय - पान दुकान ।
शौक से करके देखो प्यारे ,
जागेगा स्वाभिमान।।
खेती - बाड़ी खेल - कूद ,
या कोई घरेलू कार्य ।
स्वदेशी से उन्नत होगा ,
यही शर्त अनिवार्य ।।
खाली निकम्मे मत बैठो ,
कमाते रहो कुछ पैसे ।
बचत करो जिंदगी सँवारो ,
क्यों जीते हो जैसे - तैसे ??
अपनी भाषा संस्कृति ,
स्वदेशी अपनाओ ।
आत्म निर्भर भारत होगा ,
स्वरोजगार बढ़ाओ ।।
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