जिला- रायगढ़,छत्तीसगढ़
विषय- अद्वितीय सच
विधा- लघु कथा सृजन
शीर्षक- जंगली
*जंगली*
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अलार्म की घण्टी बजते ही आशा हड़बड़ा कर उठ गई, और दौड़कर मम्मी पापा को उठाते हुए बोली नहीं जाना है क्या गाँव, चलो जल्दी उठो।आशा आज बहुत ही खुश थी और उत्सुक भी क्योकि बरसो बाद गाँव जाने का मौका जो मिला था। पुरखो का घर जमीन था पर पापा का नौकरी लगने के बाद गांव छूट गया था। आशा को गाँव से लागव नही था पर झरने जंगल बहुत पसन्द थे ।लॉक डाउन में बोर होकर उसे लगा कि दो चार दिन प्रकृति का आनंद लेने गांव चलें,पर आशा को गाँव ले जाने का पापा का उद्देश्य अलग था, पापा हमेशा गाँव मे बस जाना चाहते थे पर गांव देहात के प्रति आशा का नाकारात्मक और घृणित सोच की वजह से परेशान थे।हरेली का त्योहार था ऐसे मौके में आशा को गांव ले जाना उचित लगा।
इधर आशा हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता की मनोहर अप्रतिम तस्वीर को मन मे संजोय जैसे ही गाँव पहुंची, गांव पहुचते ही आशा के सपने जैसे धरे के धरे रह गए क्योकि आशा के पूर्वजो का जो घर था उसी के बगल मे विरहोर जनजाति का गाँव बस गया था।
आशा आदिवासियों से नफरत करती थी और उन्हें देखकर भड़क गई अपने पापा से वापस जाने की जिद करने लगी पर पापा बोले आये हो तो यहाँ एक सप्ताह रुक लो गांव के बारे थोड़ जान लो, फिर चले जायेंगे।एक सप्ताह बीत चुके थे आज आशा जंगल की तरफ घूमने चली गई गाँव से गुजरते हुए आदिवासियों पर ध्यान अटक गया वह क्या देखती है, लोग पेड़ की पूजा कर रहे है ,यह दृश्य उसके लिए किसी करंट से कम नही था।घर आकर अपने पापा से बोलती है पापा ये आदिवासी लोग कितने बेवकूफ है पेड़ की पूजा करते है, पापा बोले बेटी घृणा त्याग कर उनके बीच जाया करो यकीन मानो उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
पापा की बाते रात भर परेशान करती रही, ये जंगली लोगो से क्या सीख मिलेगी।
आज भोर से आशा उठकर बिरहोर बस्ती में चली गई।
हरेली त्योहार की तैयारी जोरों पर थी, आशा अक्सर छतीसगढ़ी संस्कृति पर भाषण दिया करती थी ,त्योहारों पर स्टेटस डाला करती थी। आज यथार्थ सब कुछ देख कर अनजाना सुख की अनुभूति कर रही थी लोगो का उत्साह नृत्य संगीत आत्मीय प्रेम अनायास ही काल्पनिक सा लगने लगा था,झोपड़ी और पेड़ो पर मचान देखकर बड़े बडे रिसॉर्ट का सुख भूल रही थी।करमा नृत्य देख कर फ़िल्म की नृत्य ओछे लगने लगे थे,उनके झोपड़ी में बैठकर ए .सी.बेकार लगने लगी थी,चूंकि आशा गाँव के गोंटिया की बेटी थी तो उसका स्वागत भी उसी तरह हुआ, वह भूल गई कि वह आम लड़की है एक देवी सा अनुभव करने लगी थी।आशा कल्पनाओं की दुनिया मे अठखेलियाँ कर रही थी।आशा के मन मे बहुत सारे सवाल घूमने लगे थे। पेड़ पूजा की बात वह भूली नही थी वह पूछ बैठी की आप लोग पेड़ की पूजा क्यो करते हो , जबाब था पेड़ में देवता का वास होता है जो धरती की रक्षा करती है और पशु पक्षी हमारे पूर्वजों की निशानी है उनमें हमारी आत्मा बसती है,आशा हतप्रभ सुनते रह गई और सोचने लगी जिन्हें हम पिछड़ा जंगली कहते है उनकी सोच पढ़े लिखे लोगो से कितना ऊपर है, कितना सही कहा पेड़ ही तो धरती की रक्षक होतो है हम पढ़े लिखे लोग भौतिक सुख और विकास की लोलुपता में धरती को उजाड़ रहे है पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे है और ये जंगल के रहवासी इसी जंगल की पूजा कर रहे है पशु पक्षी में अपने पूर्वजों की आत्मा देख रहे है। आज आशा का सर झुक चुका था, आदिवासियों के प्रति आशा का घृणा प्यार में बदल चुकी थी। वह उन सभी से बड़े सम्मान पूर्वक मिलकर बहुत कुछ सीख कर आ रही थी जो पाठ्यक्रम से कभी नही सीख सकी थी। आशा आज बहुत खुश थी, नम आंखों में अपने पापा से लिपट गई और बोली पापा आपने सच ही कहा था आदिवासियो से हमे सीख लेनी चाहिए। आशा अपने जीवन के इस खुशनुमा पल को नही भूलना चाहती थी, आज फ़ेसबूक में हरेली त्योहार का स्टेटस डालते हुए चेहरे पर वास्तविक मुस्कान थी और मन मे गर्वता की भावना थी।
मौलिक रचना
अजय पटनायक
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