Tuesday, September 1, 2020

बलौदाबाजार से लीलधर कुम्हार की रचना- वनांचल में शिक्षा

रचनाकार - लीलधर कुम्हार
जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विधा - कविता (उत्प्रेक्षा अलंकार)
शीर्षक - वनांचल में शिक्षा

सुख-सुविधा से वंचित हैं ,
देश के मूल आदिवासी ।
जंगल पठार के रहने वाले ,
निर्धन सरल विश्वासी ।।
मेहनतकश मन-वचन के पक्के ,
पिछड़ेपन के परिचायक ।
सभ्यता और संस्कृति उनकी ,
मानो नहीं आज के लायक ।।
अंधविश्वास व कुरीतियों में ,
जीवन भर जकड़े रहते हैं ।
घिसी-पिटी प्राचीन प्रथा को ,
पीढ़ियों तक पकड़े रहते हैं ।।
ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा ,
यदि उनको मिल जाये ।
छुपे हुए गुदड़ी के लाल ,
ज्यों गुलाब - सा खिल जाये ।।
तीर - कमान और भाला - बंदूक ,
कुश्ती कबड्डी में कुशल ।
शिक्षा और आर्थिक सहयोग से ,
छा जायेंगे विश्व पटल ।।
जन जातियों की देश मे ,
बहुलता और विविधता ।
सूरज चंदा तारे जैसे ,
मानो धरती की सुंदरता ।।
चार तेंदू महुआ बाँस ,
हर्बल औषधि वनोपज ।
रोजी -रोटी जीविका है ,
वनांचलों का जीवन - सच ।।
बिरसा मुंडा दशरथ मांझी ,
शहीद वीर नारायण ।
आज भी देश को जरूरत है ,
ऐसे योद्धा कर्तव्यपरायण ।।
जल जंगल जमीन के प्रहरी ,
देश के असली सेवक हैं ।
आदिकाल से इनका जीवन ,
मानो मिट्टी की महक है ।।
गोंड भील जनजाति सारे ,
सच्चे निडर बहादुर हैं ।
एकलव्य शबरी के वंशज ,
आज भी कोसों दूर हैं ।।
केवल शिक्षा की ज्योति से ,
होगा सर्वांगीण विकास ।
दूरस्थ वनांचल चमकेगा ,
रायपुर दिल्ली तक आभास ।।
पुलिस कलेक्टर मंत्री बनकर ,
देश का नाम बढ़ायेंगे ।
विज्ञान चिकित्सा सेना में भी ,
मानो सुगंध फैलायेंगे ।।
शिक्षा से होगा परिवर्तन ,
वनांचलों का कायाकल्प ।
शिक्षा हेतु चले नियमित ,
बहुउद्देशीय विशेष प्रकल्प ।।

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