स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (उत्प्रेक्षाअलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"वनांचल"
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वनांचल गांव मानो ,सुकून के छांव
हलचल नहीं मानों,मानव के नहीं पाँव
थोड़े में जीवन गुजार कर
खुश हो लेते हैं,थोड़े में सब पाकर।
दिन दुनिया से रहते बेखबर
कुएं के मेंढक बन करते गुजर-बसर
दीपक लगे मानो दिवाकर
अंधेरा है जानो जीवन के अंदर ।
ज्यों जन जागरण की उठेगी लहर
त्यों नवविहान होगा उसी प्रहर
शिक्षा की ज्योत जलेगी वन की डगर
निश्चय ही घर- घर उगेगा भाष्कर ।
वन उपज का उचित होगा दोहन
वनांचल का न हो पायेगा शोषण
मानो जन -जन शिक्षित होगा
निश्चय वनांचल विकास गढ़ेगा ।
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उत्प्रेक्षा अलंकार:-वनांचल गांव मानो,सुकून के छांव।
हलचल नहीं मानों,मानव के नहीं पाँव।
दीपक लगे मानो दिवाकर ।
ज्यों जन जागरण की उठेगी लहर
त्यों नवविहान होगा उसी प्रहर ।
निश्चय ही घर- घर उगेगा भाष्कर
मानो जन -जन शिक्षित होगा
निश्चय वनांचल विकास गढ़ेगा
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