जिला-कांकेर ,छग
विषय-10साल पहले मेरा गांव
शीर्षक- *मेरा गांव*
चूंहती जिनकी खपरैल सदा,
वर्षा के मूसलाधारों से,
ढह जाती हैं कच्ची दीवारे,
पुरवाई के बॏछारो से ।
उन ठिठुर रहे उन सिकुड़ रहे
,उन हाथन में उन पावन में ।
है अपना हिन्दुस्तान कहां,
वह बसा हमारे गांवन में ।।
ये पंक्तियां मेरे गांव के लिए समीचीन जान पड़ती हैं ।गांव आज विकास की ओर अग्रसर है ।अब झरिया का पानी कोई नहीं पीता,पेयजल के लिए हेंड पंप हैं ।सबके घरों में शौचालय है ।आज के बच्चों को कम्प्यूटर का ज्ञान है ।कृषि आधुनिक तरीके से की जा रही है ।लोगों के रहन -सहन ,खान -पान में अंतर आया है ।
किंतु ग्रामीण संस्कृति लुप्त हो रही है ।चौपाल,घानी,बैलगाड़ी,संयुक्त परिवार का लोप होता दिखाई देता है ।शहर की ओर पलायन करते लोग चहुंओर दिखाई पड़ रहे हैं ।
फिर भी मेरा गांव मुझे आज भी अमराई,अमरुद के बच्चे,जामुन का व शिव जी का मंदिर प्रेरित करता है ।तभी तो ये पंक्तियां समीचीन जान पड़ती हैं-
*थोड़े में निर्वाह यहाँ है,*
*ऐसी सुविधा और कहां है।*
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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