जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-भ्रमर
विधा-कविता (मुक्त छंद)
अलंकार-उद्धरण अलंकार
मन भ्रमर भटकता क्यों तू,
दुनिया दो दिन का है मेला।।
कभी आसमां में है बादल ,
कभी धूप का छाये है रेला।।
कभी मिले फूलों की बगिया,
कभी कांटों का मिले सेहरा।।
मन भ्रमर क्यों बाग में घूमे,
फूल की चाह में नैन तरसे।।
अंसुवन जल से मन न माने,
पानी को वो पल भर तरसे।।
जीवन पल भर का है मेला,
है सुख और दुःख का रेला।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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उद्धरण अलंकार-
1-मन भ्रमर।
2-कांटों का सेहरा।
3-सुख दुःख का रेला।
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