स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता (निदर्शना अलंकार)
शीर्षक - अंधविश्वास
व्याख्या--कवि के द्वारा अंधविश्वास में जकड़े हुए लोगों का वर्णन किया गया है ,इसके दो पक्ष होने के कारण इसको जड़ सहित समाप्त करने में कठिनाई है, विज्ञान और सद शिक्षा से इसे मिटाया जा सकता है ।
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अंधविश्वास
अंधविश्वास सारे जग में फैला, कैसे उससे बचाएं हम ।
कोई त्यागे कोई ग्रहण करें, किस को क्या समझाएं हम ।
अंधविश्वास का असली जड़,
भूत- प्रेत का डर है ।
जादू- टोना, विवाह, व्यापार,
सब पर इसका असर है ।
कोई उसका चादर ओढ़े कोई फेंके, कैसे कदम उठाएं हम ।
कभी यह होते बड़े काम के,
कभी यह नुकसान दायी।
कभी यह मनोरंजन के साधन,
कभी यह सामाजिक बुराई ।
कभी लाभ कभी हानि इससे,किस किनार पर जाएं हम ।
चर्च, दरगाह, मंदिर, मस्जिद,
कभी मिलते बेचते अनेक ताबीज ।
बाबा,संत फकीर इस आड़ में,
करते हर मन पर काबीज ।
उनके चलते धंधे लोगों को बनाते अंधे, कैसे राह दिखाएं हम
भभूति देकर ठगते लोग,
भगा देंगे कह करके रोग ।
संकट बाधा सब दूर होंगे,
दिखाते चमत्कार का योग ।
नींबू और हरी मिर्च का टोटका, कैसे मन से हटाएं हम ।
झाड़ फूंक चंगाई सभा,
रत्न का भी बोलबाला है ।
कर्म काण्ड, रीति रिवाज,
ज्योतिष, लाल किताब निराला है ।
कोई बचें कोई डूबे उसमें, कैसा मारग बनाएं हम ।
आंख मूंदकर मानने वाले,
लोगों से हम क्या कहें ।
अगर नहीं कुछ कहते तो,
कब तक हम चुप रहें ।
मनसे से इसकी जड़ मिटाएं,या इसको सजाएं हम ।
लोगों को विश्वास में लाओ,
विज्ञान के पास में लाओ ।
लोगों को जागरूक बनाओ,
देकर शिक्षा इसे मिटाओ ।
शिक्षा का सहारा लेकर आओ छुटकारा पाएं हम ।
गिरधारी लाल चौहान
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