जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - कृषक
विधा - छंद मुक्त कविता
( विशेषोक्ति अलंकार )
शीर्षक - अन्नदाता कृषक
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// अन्नदाता कृषक //
कृषक हमारे अन्नदाता ,
पालन - पोषण कर्ता ।
माटी पुत्र कहाने वाला ,
सबकी मिटाते उदर - क्षुधा ।।
सीधा - सादा सरल मेहनती ,
सुख - सुविधा से दूर ।
सींच पसीना फसल उगाते ,
स्वयं भले मजबूर ।।
घोर गरीबी और महँगाई ,
सदियों से है निगल रहा ।
शोषित - पीड़ित ये किसान ,
आज पर्यन्त तड़प रहा ।।
आय सभी की बढ़ जाती है ,
केवल कृषक को छोड़कर ।
मिलता नहीं उचित कीमत ,
ठगे जाते हैं क्योंकर ??
खुले हाथ देते रहना ही ,
उनका शाश्वत धर्म है ।
त्याग और सेवा जीवन की ,
सुमन सुवासित मर्म हैं ।।
शासन करती है प्रयास ,
फिर भी कृषक दुःखी हैं ।
ग्रामीण अंचल में ज्यादा ,
कई समस्याएँ दबी हैं ।।
यूरिया डी. ए. पी. कीटनाशक ,
जितना ज्यादा करते प्रयोग ।
उतना ही नुकसान फसल को ,
होते निष्फल किसान का उद्योग ।।
जहरीली ये खाद - दवाई ,
उपजाऊ नहीं करते बंजर ।
धरती मे विकृति ला रही ,
कृषि कार्य को हानिकर ।।
इसीलिए अब जैविक खाद ,
खेत मे डाले जाते हैं ।
शुद्ध निरापद खान - पान ,
आज सभी अपनाते हैं ।।
मातृभूमि का जीवन भर ,
गाते हैं मंगल गुणगान ।
पूरा हक सम्मान मिले ,
जय हो जय जय कृषक महान ।।
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विरोधाभास अलंकार -
1- आय सभी की.....
2 - शासन करती है.....
3 - यूरिया डी. ए. पी....
4 - जहरीली ये खाद....
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