रचनाकार :एच-एस-अरमो "अरमान "
जिला:-रायपुर ।
विषय:-कृषक ।
विधा:-विशेषोक्ति अलंकार ।
शीर्षक:-"भारतीय कृषक" ।
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मैं हूँ,गाँव का एक कृषक---
मालगुजार और जमींदार हूँ ।
शान-शौकत,अनाजों का भंडार है,
नौकर-चाकर,घोड़ा-गाड़ी है,
बस एक,अपनी औलाद नहीं है ।
मैं खेतिहर सीमान्त कृषक हूँ---
हुई अच्छी बारिश भी---
पर,अनाज का उत्पादन हुआ कम,
बंजर और भाटा,मेरी जमीन है,
परिवार का बोझ भी,है अधिक,
साहूकार का,हमेशा,रहता कर्जदार हूँ।
भारत एक कृषि प्रधान देश है---
विविध भौगोलिक संरचना है,
कहीं समतल,तो कहीं बंजर,
तो कहीं उपजाऊ जमीन है ।
कहीं सिंचाई का साधन है,तो--
कहीं स्वर्ग भरोसे, फसल है ।
विविध फसलें,विविध भू-स्थलों में--
कृषकों के लिए,वरदान है ।
उत्तर भारत,में रबी की फसलें---
मध्य-पूर्वी,दक्षिण भारत में---
धान की,प्रमुख फसलों की शान है ।
तीन ऋतुओं का,है देश हमारा---
कृषि-नीतियाँ,कृषक हित में बनती ,
पर,किसी को लाभ मिले,किसी को नहीं,
फसलों का उत्पादन,है बढ़ा,
पर,फसलों के,दाम उतने नहीं है बढ़ा।
कृषक की खुशहाली होती---
जब समय पर,बरसात होती,
फसल समय में और नुकसान न होती,
फसले बेचता,देश हित में,बात होती ।
"किसान कर्ज में पैदा होता---
और कर्ज में डूब मरता " ।
ये बात,आज सरेआम होता--
उधारी से,बीज,खाद और--
फसलों को उगाने में,खर्चा अधिक होता,
पर,उतनी आय,कदापि प्राप्त न होती।
आज,कुछ कृषकों की,हालत ढीली है,
जैसे-गरीबी में,आटा गीला, है ।
चेहरे की,मुस्कान हुई गायब ,अब ,
बेटी भी,हुई सयानी अब---
ब्याह कराने,कर्जे में हैं डूब ।
आज कृषक ,स्वहित में,कर रहे--
सड़कों पर,आन्दोलन कर रहे हैं ।
उनकी,सन्तानें,अब कृषि कार्य से---
अक्सर,मुँह ,मोड़ते रहें हैं--
इसलिए,बड़ी,उम्रदराज कृषक ही--
खेती का,अक्सर कार्यं ,करते हैं ।
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व्याख्या:--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि भारतीय कृषक ,यहाँ की भौगोलिक स्थिति के अनुसार ही, जीवन व्यापन करना पड़ता है ।
****स्वरचित प्रस्तुतीकरण *******
एच-एस-अरमो ,अरमान ,रायपुर छ.ग।
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