रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विषय:-नदी ।
शीर्षक:-""नदी "" ।
विधा:-छ्न्द-मुक्त (कविता)
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●~~~<<| नदी |>>~~~●
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मैं एक नदी हूँ--
सरित-प्रवाह की,सरिता हूँ ।
मैं पावन-निर्मल गंगा हूँ---
गंगोत्री से उद्धगम होती ,
पाषाणों को चिरती हुई,
पवित्र तटीय धामों को छूती,
अविरल बहती जाती हूँ ।
मेरा संगम स्थल---
पवित्र तीर्थ स्थल बनता ,
हर तीज-त्यौहार में---
मुझमें भक्तजन डुबकी हैं,लगाते ,
पाप-पुण्य समाप्ति की---
कामना जो हैं,कर जाते ।
पितृपक्ष में,पितरों का---
श्राद्ध-तर्पण,मुझमें ही करते ।
दीपदान ,पिण्डदान कर ,
पूर्वजों की आत्मा -शाँति का--
प्रयोजन कर ,धन्य होते ।
मैं हूँ तो,धरा में,सबका जीवन है,
इसलिए कहा जाता है--
"जल ही जीवन है " ---
सब जीव-जन्तु की पालनहार ।
मैं,जलनिधि बन---
बांधों,जलाशय का रूप धारण करती,
कृषि,उद्योग,मानवों के लिए---
जल आपूर्तिदायनी बन जाती ।
आज मुझे,प्रदूषित कर दिया,तुमने,
मेरी,पवित्रता,निर्मलता,दागदार हुई ,
फिर भी मैं,गंगा हूँ---
हर नदी का जल,गंगाजल होता है,
इसके छीड़कने मात्र से ही---
शुद्धता का भान ,हम हैं करते ।
मेरा विकराल रूप जब होता ---
बाढ़ का प्रकोप ,आफ़त,है बनता,
होती है,जन-धन की भारी हानि,
मैं नहीं चाहती,हो,कोई भी विनाश,
पर,इसके लिए,हम लोग ही,जिम्मेदार,
समय रहते,तुम चेत जाओ,
अपना और आने वाली पीढ़ियों का--
जीवन बचाने,अब भी,सम्हल जाओ।
मेरा अन्त,मेरा समर्पण---
हो जाता,सिंधु के आगोश में,
मेरा मृदु जल,हो जाता वहाँ खारा,
मेरी अच्छाई-बुराई को,वो पीता,
सागर से-महासागर बन जाता ।
फिर भी,हम नदियाँ हैं महान् ,
विश्व-मानव सभ्यता की,हम हैं,
अनमोल-धरोहर व पहचान,
मेरा ख्याल,तुम रखोगे---
मैं भी,जीवनदायनी बन---
सदा खड़ी रहूँगी--
तुम्हारे हित के साथ,हितकारी बन ।
========इति==========
व्याख्या:-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि नदी की महिमा अपार है और उसी से मानव जाति की सभ्यता और संस्कृति विकसित हुई है ।
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