रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पता - पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विधा - कविता
शीर्षक - जीवन और नदियाँ
जीवन और नदियाँ
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चट्टानों के उर चीर ,
प्रस्फुटित भई जल की धारा ,
निर्झर बन झरते झर-झर कर ,
सींचते जल से जो जग सारा ,
बालमन से उछलकूद कर ,
चट्टानों में खेला करती ,
बन दरिया उत्ताल तरंग ,
मौजों को कभी झेला करती ,
बढ़ती अवरोधों को पार कर ,
यौवन के मेले - झमेले में ,
सिखलाती नदियाँ बहती ,
रुकना न कभी अकेले में ,
चलना - बहना नित काम है ,
सुख - दुख तो केवल नाम है ,
होता न कोई स्थिर जग में ,
कब मंजिल तक आराम है ?
जरा यूं स्थिर जल नद का ,
जग का कचरा जब ढोती है ,
तब मातृ स्वरूपा वृहद हृद कर ,
सुख देती अपनों को पर मन से वो तो रोती है ,
तन का गन्दा होना तब तक ,
जब अहंकार - विकार यूं फैली है ,
दोष (कचरा) मढ़ते रहते दूजे में ,
इसलिए हर नदियाँ मैली है ,
सागर सा जग के भाग्य विधाता ,
जग पाता विश्राम यहीं ,
गोते खाते नदियाँ को भी ,
सागर से पहले आराम नही ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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