स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (विरोधाभाष अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"रोजगार"
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सरकार के वायदे हैं
विकास की बातें हैं
सरेआम बेरोजगारी दिखे
फिर भी कोई उनसे
सवाल नहीं करता ।
बढ़ रहे उद्योग-धंधे
अनगिनत फैक्टरियां
बढ़ रही क्षमताएं हैं
फिर भी जाने क्यों
रोजगार नहीं मिलता ।
बेरोजगारी की लाचारी
या कहें बदकिस्मती
हाथों को काम नहीं मिलता
पढ़े-लिखे नौजवानों को
मुकाम नहीं मिलता ।
रोजगार का है अधिकार
सह रहे हैं फिर भी
बेरोजगारी की मार
ठेकेदारों के आगे
फिर भी दाल नही गलता।
मजदूरों का पसीना
मशीनों ने है छीना
आज व्यवसाय बढ़ा है
फिर भी ब्यापारी के
दिल में मलाल नहीं पलता।
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