Saturday, September 26, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना- रोजगार

नाम-गिरधारी लाल चौहान
    स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ती
    जिला- जांजगीर-चांपा/छत्तीसगढ़
   विधा-कविता (विरोधाभास अलंकार पर आधारित)
   विषय-रोजगार
    शीर्षक----हाथों में रोजगार

         हाथों में रोजगार है, जीवन चमकदार है ।
       वेतन मिलता घर में उस दिन, बैठा साहूकार है ।

   चारों तरफ है मौज मस्ती,जान रहा इसे सारी बस्ती ।
    दस हजार की तनख्वाह ,और सौ सौ लेनदार है ।

   खाते पीते मौज मनाते, अपने काम पर हम है जाते ।
कमी दिखे वहां हाथ फैलाते ,सबकी नजर में ईमानदार हैं ।

किराये की मकान में रहते, अधिकारी जैसे शान में रहते ।
आफीस में बाबू का काम करते,रोज पत्नी से तकरार है ।

बच्चों की फीस पटा नहीं, बिजली बिल बकाया है ।
  माता पिता को देते नहीं,जिनकी कृपा अपार है ।

ऐसी नौकरी ऐसी  तनख्वाह ,में हम मित्रों जी रहे ।
   हमसे तो अच्छा घर में पड़ा ,एक बेरोजगार है ।

    मात पिता की सेवा कर रहा,उनकी नजरों में रह रहा ।
       घर में वह है बड़े काम का, अपना पूरा बेकार है ।

रोजगार और बेरोजगार शब्द ,विष अमृत समान है ।
दोनों का मजा लेने वाला ,और कोई नहीं इंसान है ।

व्याख्या-कवि के द्वारा रोजगार प्राप्त व्यक्ति एवं बेरोजगार व्यक्ति की तुलना करते हुए  वर्णन किया गया है । उनके जीवन शैली कैसी होती है । और किस तरह जीवन जीते हैं उसका चित्रण किया गया है ।

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