स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला- जांजगीर-चांपा/छत्तीसगढ़
विधा-कविता (विरोधाभास अलंकार पर आधारित)
विषय-रोजगार
शीर्षक----हाथों में रोजगार
हाथों में रोजगार है, जीवन चमकदार है ।
वेतन मिलता घर में उस दिन, बैठा साहूकार है ।
चारों तरफ है मौज मस्ती,जान रहा इसे सारी बस्ती ।
दस हजार की तनख्वाह ,और सौ सौ लेनदार है ।
खाते पीते मौज मनाते, अपने काम पर हम है जाते ।
कमी दिखे वहां हाथ फैलाते ,सबकी नजर में ईमानदार हैं ।
किराये की मकान में रहते, अधिकारी जैसे शान में रहते ।
आफीस में बाबू का काम करते,रोज पत्नी से तकरार है ।
बच्चों की फीस पटा नहीं, बिजली बिल बकाया है ।
माता पिता को देते नहीं,जिनकी कृपा अपार है ।
ऐसी नौकरी ऐसी तनख्वाह ,में हम मित्रों जी रहे ।
हमसे तो अच्छा घर में पड़ा ,एक बेरोजगार है ।
मात पिता की सेवा कर रहा,उनकी नजरों में रह रहा ।
घर में वह है बड़े काम का, अपना पूरा बेकार है ।
रोजगार और बेरोजगार शब्द ,विष अमृत समान है ।
दोनों का मजा लेने वाला ,और कोई नहीं इंसान है ।
व्याख्या-कवि के द्वारा रोजगार प्राप्त व्यक्ति एवं बेरोजगार व्यक्ति की तुलना करते हुए वर्णन किया गया है । उनके जीवन शैली कैसी होती है । और किस तरह जीवन जीते हैं उसका चित्रण किया गया है ।
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