संबलपुर, जिला-कांकेर (छ.ग.)
विषय :-रोजगार,(विरोधाभास अलंकार)
दिनाँक :-26.09.20
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~"" *बेरोजगारी* "" ~
देखो कुदरत ने
कैसी माया फैलाई,
बड़ी-बड़ी डिग्री धारी को
बेरोजगारी ने धता दिखाई।
सपन सलोने पाले,महंगी
शिक्षा को गले लगाएं,
दर-दर भटक रहे जो भावी
राजकुमार थे कहलाएं।
किताबों का बोझ,
महंगी ट्युशन फीस,
गुणवत्ता हाल-बेहाल हुई,
मन में उठी टीस।
जिंदगी उनकी
कैसे कट रही क्या कहूँ,
ना जी रहा हूँ ना जिंदा हूँ
ये बात कैसे सहूँ।
उनके अरमानों के रुदन में
सातों सुर है ढलता,
उम्मीदों के मुस्कानों में
दावानल है पलता।
साक्षात्कारों में मीठे बैन संग
भीतर ज्वाल लिए दिखता,
तीक्ष्ण नजरों में ही भाले,
तीर चलाना सीखता।
*विरोधाभास का प्रयोग*-
1.गुणवत्ता हाल बेहाल हुई।
2.ना जी रहा हूँ ना जिंदा हूँ।
3.रुदन में सातों सुर ढलता।
4.मुस्कानों में दावानल पलता।
5.मीठे बैन में ज्वाल लिए दिखता।
6.तीक्ष्ण नजरों में भाले तीर चलाना
सीखता।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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