रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद
शीर्षक- फिर खामोश मनीषा
वह दलित की थी,या ब्राम्हण की थी
जो भी थी वह भारत की बेटी थी
बार-बार हो रहा है ये अत्याचार
और अब भी खामोश सोई है सरकार
दरिंदो की दरिंदगी और बढ़ रही
क्योंकि सदियों की घिसी पिटी
देश की कानून व्यवस्था ही
उनके हौसलों को हवा दे रही
जब मनुष्य को मनुष्य का दर्द दिखाई न दे
उसकी ख़ौफ़नाक चीखें सुनाई ना दे
रीढ़ की हड्डी तोड़,जिह्वा काट ले जो
सामूहिक बलात्कार कर मरने को छोड़ दे जो
उसे पशु कहना भी शायद अन्याय होगा
किसी से जीने का हक छीन लेना
और जान के बदले सिर्फ मुआबजा देना
क्या उसके परिजनों की खुशियां लौट आएंगी?
निर्भया, आशिफ़ा, प्रियंका हो या फिर खामोश मनीषा
ऐसे ही कई प्रतिपल लुटती बेटियों की आबरू है
और हम आज भी बेबस इन घटनाओं के साक्षी हैं
बदलाव और न्याय के लिए एक लंबी लड़ाई अभी बाकी है।
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