रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)
विषय - समाज सेवा
विधा - निबंध लेखन
शीर्षक - समाज सेवा
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
// समाज सेवा //
**********
हम सब सामाजिक प्राणी हैं । जीवन भर समाज से लेते रहते हैं । समाज के सहयोग के बिना हमारा अस्तित्व शून्यवत् है। अतः समाज के हम ऋणी हैं । तो हम भी समाज की कुछ सेवा करें । बड़े - बड़े महापुरुष अपना सारा जीवन समाज सेवा में अर्पित कर देते हैं । साधारण आदमी भी कोई न कोई सेवा कर सकता है ।
समाज सेवा के लिए बड़ा पद या बहुत पैसे चाहिए , ऐसी बात नहीं है । आप छोटे से छोटे स्तर से भी यह कार्य शुरू कर सकते हैं जैसे - बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना , अपने मोहल्ले में स्वच्छता अभियान चलाना , नशा मुक्ति अभियान , बाल संस्कार केंद्र चलाना, निर्धन कन्याओं की शादी में आर्थिक सहयोग कर देना , गरीब विद्यार्थियों के पढ़ाई खर्च को वहन करना या कुछ मदद कर देना , निःशुल्क कोचिंग या ट्यूशन देना, गरीब बस्ती या अस्पताल में जाकर कपड़े फल मिठाई आदि बाँटना । ऐसे बहुत से कार्य हैं जो हम निःस्वार्थ भाव से कर सकते हैं । अपने बच्चे या रिश्तेदारों के लिए तो खूब करते हैं लेकिन बिना लाभ के समाज के अन्य लोगों की सेवा बहुत बड़ा ईश्वरीय कार्य है जो हमें आत्मिक संतुष्टि व लोकप्रिय बनाती है । समाज सेवा एक प्रकार से जनता जनार्दन की सेवा है , राष्ट्र की सेवा है , अपने आप की सेवा है ।
समाज मे अच्छाई - बुराई का दौर चलता रहता है । अतः समाज सुधार और मार्गदर्शन की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है । कबीरदास जी , स्वामी विवेकानंद , महात्मा गाँधी आदि महापुरुष समाज सेवा को ही सर्वस्व मानते थे । यदि हम थोड़ा भी समाज के लिए कुछ करते हैं तो यह बड़े पुण्य का कार्य है , भलाई का कार्य है । रामायण में कहा गया है -
' पर हित सरिस धर्म नहीं भाई ।
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई ।। '
अर्थात् औरों का हित या कल्याण या परोपकार करना सबसे बड़ा धर्म है तथा दूसरों को दुःख देना या पीड़ा पहुँचाना अधर्म है। तात्पर्य यही है कि समाज की सेवा मानवता की सेवा है जो सही अर्थ में मानव धर्म है । इसीलिए एक सूक्ति है - ' नर सेवा नारायण सेवा । ' समाज सेवा नर - नारी के अंतःकरण में व्याप्त नारायण की सेवा , पूजा और बन्दगी है ।
समाज सेवा का श्रेष्ठ माध्यम है किसी संत - महापुरुष के दैवी कार्य मे सहभागी हो जाना । इससे पुण्य - लाभ के साथ - साथ मन की शांति , भक्ति ,मुक्ति और ईश्वर की करुणा - कृपा के शीघ्र अनुभव होते हैं । जैसे श्री राम सेतु निर्माण कार्य मे नन्ही गिलहरी की सेवा आज भी प्रेरणादायी है जो बड़ी श्रद्धा व आदर से याद किये जाते हैं ।
अंत मे निष्कर्ष यही निकलता है कि समाज सेवा का अपना विशेष महत्व है । प्रत्येक व्यक्ति को रोजमर्रा की जिंदगी में से कुछ समय समाज सेवा के लिए अवश्य निकालना चाहिये । अपने लिए तो कुत्ता , घोड़ा , गधा ,चूहा सभी प्राणी जीते हैं । अपने और अपने परिवार के लिए कमाना खाना- खिलाना कोई बहादुरी नहीं है । आहार , निद्रा , भय और मैथुन सभी जीवों में स्वाभाविक रूप से होते हैं । यदि हम भी सारा जीवन इसी मे लगा दिए तो मनुष्य होने का क्या लाभ ? देश , धर्म और समाज की सेवा ही सर्वोपरि है जो हमे सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाती है । औरों की सेवा व भलाई के कार्य करने से सिंह जैसा बल आ जाता है - ये महापुरुषों का अनुभव है जिनका फायदा हम भी ले सकते हैं ।
No comments:
Post a Comment