रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद काव्य
विषय-प्रतिध्वनि(अर्थान्तरन्यास अलंकार)
शीर्षक-कलाकार
हजारों बुरे काम कर
चेहरे पे मुस्कान रखते हैं
क्या मन के अंतर्द्वंद्व की
प्रतिध्वनि सुनाई नही देती?
क़त्लेआम कर चुप हैं
हाहाकार मचा खामोश हैं
उसके घर देर हैं अंधेर नही
अर्जियां वहां भी खारिज होंगी
रंगमंच की कठपुतलियां हैं सब
डोर उसके हाथों में है
निज कर्मो के आधार पर
हिसाब अभी होनी है
मौत पे राजनीति हो रही
या राजनीति पे मौत
पर्दे के कलाकार हैं ये
ये इनके कला पे है पर्दा
किरदार बड़े उम्दा हैं
धुएं में उड़ा रहे हैं जिंदगी
मौत को लगा रहे गले
आज देश इनपर शर्मिंदा हैं।
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