स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा-आलेख
शीर्षक -"मेरा गांव मेरी मुस्कान"
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बात बरसों पुरानी है ।मेरे पिताजी वन विभाग में रेंजर के पद पर थे और हमेशा गांव से बाहर ही रहे । किसी भी स्थान पर 3 वर्ष से अधिक रहे हो मुझे तो याद नहीं । हर 3 वर्ष के पश्चात स्थानांतरण होने से एक नई जगह और मेरे लिए एक नया स्कूल ,नया माहौल यही कारण है कि आज मेरे स्कूल की सहेलियों में गिने-चुने नाम ही मौजूद हैं । आप सोच रहे होंगे कि यहां गांव की तो कोई बात नहीं हो रही सिर्फ परिवार की बातों को बताया जा रहा है । लेकिन मेरा परिवार, मेरे पिताजी की नौकरी इन दोनों का सीधा- सीधा संबंध मेरे गांव से है ।अतः मुझे इसका जिक्र करना पड़ रहा है । जहां तक मेरी जानकारी है गांव में रहने वाले लोग गांव से पलायन करके शहरों में बसते हैं ,और यहां एक मेरा परिवार था जो शहरों में रहकर गांव में बसने जा रहा था।
बात उन दिनों की है जब मेरे पिताजी का स्थानांतरण रायगढ़ से जांजगीर चांपा हो गया ।। उनकी सेवा मुक्ति से कुछ 3 साल पहले ।उन्होंने क्या सोचा क्यों सोचा मुझे नहीं पता लेकिन वह दिन मेरे जीवन में एक सबसे बड़े बदलाव का दिन था। माता पिता जी के साथ मैं और मेरे भाई बहन सभी सदस्य गांव बनाई आने के लिए निकल पड़े पुरानी यादें मेरे मानस पटल पर रह-रह कर याद आ रही थी । मैं अंतिम बार दादी जी के स्वर्गवास के समय गांव आई थी ।उस समय गांव के दृश्य जैसे हरे-भरे खेत ,बोर के पानी में नहाना अमरैया के आम और एक हरा -भरा सुंदर सा गांव जहां के लोग सीधे-साधे । सब कुछ मेरी आंखों के सामने झूल रहा था। जब हम गांव आते थे तो दौड़ के हमारे गाड़ी के आसपास लोग एकत्रित हो जाया करते थे। इन्हीं खयालों में खोए हुए हमारा सामानों से भरा ट्रक और हमारा मार्शल गांव पहुंचने वाला था मैं बहुत खुश थी गाड़ी से बाहर का नज़ारा देख कर मुझे ज्यादा अंतर नहीं दिख रहा था। बस कुछ पक्के मकान और सड़क पक्की हो गई थी देखकर मेरी खुशी दुगनी हो गई थी। जैसे ही हम गाड़ी से उतरे लोग हमें अपने घर के दरवाजे से ही देख रहे थे। पिताजी ने दरवाजा खोला और पड़ोसी से मिलने गए ताकि सामान उतारने के लिए 2-4 आदमियों की जुगाड़ हो सके एक- डेढ़ घंटे बाद दो आदमी की व्यवस्था हो पाई और सामान के साथ हम भी घर में प्रवेश किए । इस प्रकार लोगों की हम से दूरी से मेरी खुशी आधी हो गई थी ।
शहरों में रहे पले बढ़े थे हम यहां एक-दो दिन रहना हुआ था पहले लेकिन हमेशा रहने का फर्क पता ही नहीं था पापा तो सामान सजाकर चांपा के लिए रवाना हो गए ।अब हमें अपने आपको गांव में सजने और सजाने की बारी थी। गांव पूरी तरह बदल चुका था। पास में फैक्ट्री आ गई थी। हरियाली नहीं के बराबर कईयों ने फैक्ट्री में अपनी जमीन बेच दी और प्राप्त पैसों को शहरी नक्शे कदम में चलकर बर्बाद हो रहे थे । युवा वर्ग नशा में सराबोर था ।गृहणियों के पास घर गृहस्ती के कामकाज के अलावा कोई काम न था। यह सब कुछ देख कर मेरी बची खुची मुस्कान भी जाती रही।
हम 10- 12 साल बाद गांव आए थे । मगर गांव का बदला स्वरूप देखकर लग रहा था , कि सदियां बीत गई हो । शहरों की ही तरह यहां के लोगों को भी किसी से कोई मतलब नहीं था। बस खुद के लिए जी रहे थे । प्राथमिक स्तर स्कूल अब माध्यमिक स्तर का हो गया था। एक सामुदायिक भवन बना था । गांव में शासन की सैकड़ों योजनाएं चल रही थी मगर जमीनी हकीकत तो कुछ और ही थी , हां एक रुपए किलो चावल से पेट भर कर गांव आलसी जरूर होता जा रहा था। गांव में नशाखोरी जन्म ले चुका था । युवा वर्ग नशे में धुत एवं संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवार में तब्दील हो चुके थे।गांव की शिक्षा का स्तर 10 वी असफल तक सीमित थी।
आज मुझे यहां इस गांव में लगभग 10 वर्ष हो चुके हैं मैंने कुछ करने की सोची बच्चों को बुलाकर पढ़ाया और पंचायत चुनाव में अच्छे पढ़े-लिखे उम्मीदवार को सरपंच बनाने में मेरे परिवार की बहुत बड़ी भूमिका रही। नशाखोरी बंदी पर कार्य किया गया और अभी भी वर्तमान में किया जा रहा है। हर वर्ष जून-जुलाई में वृक्षारोपण किया जा रहा है । विभिन्न योजनाएं चल रही है। मुख्यमंत्री आवास योजना से मकान भी बन रहे हैं ।शौचालय का निर्माण भी हुआ है ।लेकिन....?
इतना कुछ होने के बावजूद इन 10 सालों में भी मेरा वह सुंदर हरा-भरा ,सीधा-साधा गांव जहां एक दूसरे को सब महत्व देते थे। प्यार से रहते थे । वह ना मिल सका मेरे चेहरे की वह मुस्कान अभी तक वापस ना आ सकी ।
अलविदा मेरा सुंदर गांव अलविदा।
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टीप:-यह मेरे जीवन की एक सच्ची घटना है ।
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