स्थान--नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला--जांजगीर -चाम्पा/छत्तीसगढ़
विधा --कविता(अर्थान्तर न्यास अलंकार पर आधारित)
विषय-प्रतिध्वनि
शीर्षक-कुछ नहीं अनुकुल
ध्वनि से जब मन चीढ़ता है ।
प्रतिध्वनि से कैसे हर्ष होगी ।
लौह कठोर ही हरदम रहेगा ।
किसने कह दिया नरम होगी ।
कोयल की मन आस थी ।
तुम काग पकड़कर ले आये ।
जिसको हीरा ही चाहिए ।
पीतल उसको कहां भाये ।
एक नम्बर का मित्र है मेरा ।
मत कहो उसे दो नम्बर ।
अपने काम से काम रखो ।
क्या देखना पिताम्बर निलाम्बर ।
आज उसके पैर में जूता नहीं ।
सोने चांदी का पहनता था ।
लोग उसकी तारीफ करते थे ।
भले वह सबका निंदा करता था ।
महानदी की चर्चा महान ।
तुम अरपा ,पैरी लेकर बैठे ।
हिमालय को सभी देखते ।
पत्थर को भला कौन देखे ।
सूरज में गरमी है ।
चांद में है शीतलता ।
एक समय में एक रहेगा ।
दोनों नहीं है मिलता ।
कामधेनु की इच्छा मेरी ।
तुम गदहा अपना ले जाओ ।
जिस दिन कामधेनु मिल जाए ।
उस दिन अपना चेहरा दिखाओ ।
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