रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा- मुक्त छंद कविता
विषय-रोजगार ( विरोधाभास अलंकार)
एक अदद रोजगार की तलाश में
देश के युवा भटक रहे हैं
ढेरों डिग्रियां लेकर भी
रोजगार को तरस रहे हैं
बेरोजगारी की दंश से
परिवार के परिवार बिखर रहे हैं
सरकार की योजनाएं दिखावे भर की
झूठे वादों पर राजनीति कर रहे हैं
टूटती दीवारें और टपकती छत भी
हालात पे जैसे चिढा रहे हैं
बारह करोड़ बेरोजगारी देश की
फिर भी रोजगार गारन्टी योजना बता रहे हैं
महामारी से मृत्यु दर कम हो भले
भुखमरी से संख्या बढ़ा रहे हैं
अर्थव्यवस्था से छिनती नोकरियाँ
बेरोजगारी की आशंका जता रहे हैं
जो दे रहे हैं रोजगार के अवसर
वे अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं
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