जिला :- महासमुन्द
विषय :- रोजगार
शीर्षक :- कैसे मिले रोजगार?
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- विरोधाभास अलंकार
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कला नहीं, ना कौशल का विकास हुआ,
यूं ही मंगलू स्नातक पास हुआ।
अब डिग्रीधारी घूमें बेकार,
ऐसे में भला कैसे मिले रोजगार?
काम चाहे तकनीकी कुशलता,
कार्यकुशलता में मिली विफलता।
छोटे कामों में मांगे मोटी पगार,
ऐसे में भला कैसे मिले रोजगार?
करनी नहीं खेती किसानी,
चाहे काम अपनी मनमानी।
जब समझे वह हर काम बेकार,
ऐसे में भला कैसे मिले रोजगार?
काबिल बनो कामयाबी मिलेगी,
सफलता तुम्हारी कदम चूमेगी।
बेकार हैं बिन काबिलियत डिग्री का अंबार,
बस डिग्री से कैसे मिले रोजगार?
ज्ञानी बनकर अज्ञानी रहा,
ज्ञान के प्रयोग का न ज्ञान रहा।
बस ज्ञान कैसे बने सफलता का आधार?
ऐसे में भला कैसे मिले रोजगार?
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने रोजगार ना मिलने का कारण कला कौशल का विकास ना करके डिग्री का अंबार लगाने को बताया है। साथ ही मनुष्य की अधिक से अधिक पाने की लालसा भी बेरोजगारी का प्रमुख कारण है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने विरोधाभास अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।
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